Ramayana.com

दोहा 259

चौ०

गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी॥ लोचन जलु रह लोचन कोना। जैसें परम कृपन कर सोना॥१॥

भावार्थ

सीताजीकी वाणीरूपी भ्रमरीको उनके मुखरूपी कमलने रोक रखा है। लाजरूपी रात्रिको देखकर वह प्रकट नहीं हो रही है। नेत्रोंका जल नेत्रोंके कोने ( कोये ) में ही रह जाता है। जैसे बड़े भारी कंजूसका सोना कोनेमें ही गड़ा रह जाता है॥१॥

चौ०

सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी। धरि धीरजु प्रतीति उर आनी॥ तन मन बचन मोर पनु साचा। रघुपति पद सरोज चितु राचा॥२॥

भावार्थ

अपनी बढ़ी हुई व्याकुलता जानकर सीताजी सकुचा गयीं और धीरज धरकर हृदयमें विश्वास ले आयीं कि यदि तन, मन और वचनसे मेरा प्रण सच्चा है और श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंमें मेरा चित्त वास्तवमें अनुरक्त है,॥२॥

चौ०

तौ भगवानु सकल उर बासी। करिहि मोहि रघुबर कै दासी॥ जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥३॥

भावार्थ

तो सबके हृदयमें निवास करनेवाले भगवान्‌ मुझे रघुश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीकी दासी अवश्य बनायेंगे। जिसका जिसपर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है॥३॥

चौ०

प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान राम सबु जाना॥ सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसें। चितव गरुरु लघु ब्यालहि जैसें॥४॥

भावार्थ

प्रभुकी ओर देखकर सीताजीने शरीरके द्वारा प्रेम ठान लिया ( अर्थात्‌ यह निश्चय कर लिया कि यह शरीर इन्हींका होकर रहेगा या रहेगा ही नहीं )। कृपानिधान श्रीरामजी सब जान गये। उन्होंने सीताजीको देखकर धनुषकी ओर कैसे ताका, जैसे गरुड़जी छोटे-से साँपकी ओर देखते हैं॥४॥

दो०

लखन लखेउ रघुबंसमनि ताकेउ हर कोदंडु। पुलकि गात बोले बचन चरन चापि ब्रह्मांडु॥२५९॥

भावार्थ

इधर जब लक्ष्मणजीने देखा कि रघुकुलमणि श्रीरामचन्द्रजीने शिवजीके धनुषकी ओर ताका है, तो वे शरीरसे पुलकित हो ब्रह्माण्डको चरणोंसे दबाकर निम्नलिखित वचन बोले— ॥२५९॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें