दोहा 260
दिसिकुंजरहु कमठ अहि कोला। धरहु धरनि धरि धीर न डोला॥ रामु चहहिं संकर धनु तोरा। होहु सजग सुनि आयसु मोरा॥१॥
भावार्थ
हे दिग्गजो! हे कच्छप! हे शेष! हे वाराह! धीरज धरकर पृथ्वीको थामे रहो, जिसमें यह हिलने न पावे। श्रीरामचन्द्रजी शिवजीके धनुषको तोड़ना चाहते हैं। मेरी आज्ञा सुनकर सब सावधान हो जाओ॥१॥
चाप समीप रामु जब आए। नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए॥ सब कर संसउ अरु अग्यानू। मंद महीपन्ह कर अभिमानू॥२॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजी जब धनुषके समीप आये, तब सब स्त्री-पुरुषोंने देवताओं और पुण्योंको मनाया। सबका सन्देह और अज्ञान, नीच राजाओंका अभिमान,॥२॥
भृगुपति केरि गरब गरुआई। सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई॥ सिय कर सोचु जनक पछितावा। रानिन्ह कर दारुन दुख दावा॥३॥
भावार्थ
परशुरामजीके गर्वकी गुरुता, देवता और श्रेष्ठ मुनियोंकी कातरता ( भय ), सीताजीका सोच, जनकका पश्चात्ताप और रानियोंके दारुण दुःखका दावानल,॥३॥
संभुचाप बड़ बोहितु पाई। चढ़े जाइ सब संगु बनाई॥ राम बाहुबल सिंधु अपारू। चहत पारु नहिं कोउ कड़हारू॥४॥
भावार्थ
ये सब शिवजीके धनुषरूपी बड़े जहाजको पाकर, समाज बनाकर उसपर जा चढ़े। ये श्रीरामचन्द्रजीकी भुजाओंके बलरूपी अपार समुद्रके पार जाना चाहते हैं, परन्तु कोई केवट नहीं है॥४॥
राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि। चितई सीय कृपायतन जानी बिकल बिसेषि॥२६०॥
भावार्थ
श्रीरामजीने सब लोगोंकी ओर देखा और उन्हें चित्रमें लिखे हुए-से देखकर फिर कृपाधाम श्रीरामजीने सीताजीकी ओर देखा और उन्हें विशेष व्याकुल जाना॥२६०॥
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