दोहा 261
धनुषभंग
देखी बिपुल बिकल बैदेही। निमिष बिहात कलप सम तेही॥ तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा। मुएँ करइ का सुधा तड़ागा॥१॥
भावार्थ
उन्होंने जानकीजीको बहुत ही विकल देखा। उनका एक-एक क्षण कल्पके समान बीत रहा था। यदि प्यासा आदमी पानीके बिना शरीर छोड़ दे, तो उसके मर जानेपर अमृतका तालाब भी क्या करेगा ?॥१॥
का बरषा सब कृषी सुखानें। समय चुकें पुनि का पछितानें॥ अस जियँ जानि जानकी देखी। प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी॥२॥
भावार्थ
सारी खेतीके सूख जानेपर वर्षा किस कामकी ? समय बीत जानेपर फिर पछतानेसे क्या लाभ ? जीमें ऐसा समझकर श्रीरामजीने जानकीजीकी ओर देखा और उनका विशेष प्रेम लखकर वे पुलकित हो गये॥२॥
गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा। अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा॥ दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ। पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ॥३॥
भावार्थ
मन-ही-मन उन्होंने गुरुको प्रणाम किया और बड़ी फुर्तीसे धनुषको उठा लिया। जब उसे [ हाथमें ] लिया, तब वह धनुष बिजलीकी तरह चमका और फिर आकाशमें मण्डल-जैसा ( मण्डलाकार ) हो गया॥३॥
लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें॥ तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा॥४॥
भावार्थ
लेते, चढ़ाते और जोरसे खींचते हुए किसीने नहीं लखा ( अर्थात् ये तीनों काम इतनी फुर्तीसे हुए कि धनुषको कब उठाया, कब चढ़ाया और कब खींचा, इसका किसीको पता नहीं लगा ); सबने श्रीरामजीको [ धनुष खींचे ] खड़े देखा। उसी क्षण श्रीरामजीने धनुषको बीचसे तोड़ डाला। भयङ्कर कठोर ध्वनिसे [ सब ] लोक भर गये॥४॥
भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले। चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले॥ सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं। कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारहीं॥
भावार्थ
घोर, कठोर शब्दसे [ सब ] लोक भर गये, सूर्यके घोड़े मार्ग छोड़कर चलने लगे। दिग्गज चिग्घाड़ने लगे, धरती डोलने लगी, शेष, वाराह और कच्छप कलमला उठे। देवता, राक्षस और मुनि कानोंपर हाथ रखकर सब व्याकुल होकर विचारने लगे। तुलसीदासजी कहते हैं, जब [ सबको निश्चय हो गया कि ] श्रीरामजीने धनुषको तोड़ डाला, तब सब ‘श्रीरामचन्द्रजीकी जय’ बोलने लगे।
संकर चापु जहाजु सागरु रघुबर बाहुबलु। बूड़ सो सकल समाजु चढ़ा जो प्रथमहिं मोह बस॥२६१॥
भावार्थ
शिवजीका धनुष जहाज है और श्रीरामचन्द्रजीकी भुजाओंका बल समुद्र है। [ धनुष टूटनेसे ] वह सारा समाज डूब गया, जो मोहवश पहले इस जहाजपर चढ़ा था [ जिसका वर्णन ऊपर आया है ]॥२६१॥
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