दोहा 241
राजकुअँर तेहि अवसर आए। मनहुँ मनोहरता तन छाए॥ गुन सागर नागर बर बीरा। सुंदर स्यामल गौर सरीरा॥१॥
भावार्थ
उसी समय राजकुमार ( राम और लक्ष्मण ) वहाँ आये। [ वे ऐसे सुन्दर हैं ] मानो साक्षात् मनोहरता ही उनके शरीरोंपर छा रही हो। सुन्दर साँवला और गोरा उनका शरीर है। वे गुणोंके समुद्र, चतुर और उत्तम वीर हैं॥१॥
राज समाज बिराजत रूरे। उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे॥ जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥२॥
भावार्थ
वे राजाओंके समाजमें ऐसे सुशोभित हो रहे हैं, मानो तारागणोंके बीच दो पूर्ण चन्द्रमा हों। जिनकी जैसी भावना थी, प्रभुकी मूर्ति उन्होंने वैसी ही देखी॥२॥
देखहिं रूप महा रनधीरा। मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा॥ डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी। मनहुँ भयानक मूरति भारी॥३॥
भावार्थ
महान् रणधीर ( राजालोग ) श्रीरामचन्द्रजीके रूपको ऐसा देख रहे हैं, मानो स्वयं वीर-रस शरीर धारण किये हुए हो। कुटिल राजा प्रभुको देखकर डर गये, मानो बड़ी भयानक मूर्ति हो॥३॥
रहे असुर छल छोनिप बेषा। तिन्ह प्रभु प्रगट काल सम देखा॥ पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई। नरभूषन लोचन सुखदाई॥४॥
भावार्थ
छलसे जो राक्षस वहाँ राजाओंके वेषमें [ बैठे ] थे, उन्होंने प्रभुको प्रत्यक्ष कालके समान देखा। नगरनिवासियोंने दोनों भाइयोंको मनुष्योंके भूषणरूप और नेत्रोंको सुख देनेवाला देखा॥४॥
नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप। जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप॥२४१॥
भावार्थ
स्त्रियाँ हृदयमें हर्षित होकर अपनी-अपनी रुचिके अनुसार उन्हें देख रही हैं। मानो शृंगार-रस ही परम अनुपम मूर्ति धारण किये सुशोभित हो रहा हो॥२४१॥
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