दोहा 121b
भजन-महिमा
पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ॥ नाथ मोहि निज सेवक जानी। सप्त प्रस्न मम कहहु बखानी॥ १ ॥
भावार्थ
पक्षिराज गरुड़जी फिर प्रेमसहित बोले—हे कृपालु! यदि मुझपर आपका प्रेम है, तो हे नाथ! मुझे अपना सेवक जानकर मेरे सात प्रश्नोंके उत्तर बखानकर कहिये॥१॥
प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा॥ बड़ दुख कवन कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी॥ २ ॥
भावार्थ
हे नाथ! हे धीरबुद्धि! पहले तो यह बताइये कि सबसे दुर्लभ कौन-सा शरीर है? फिर सबसे बड़ा दुःख कौन है और सबसे बड़ा सुख कौन है, यह भी विचारकर संक्षेपमें ही कहिये॥२॥
संत असंत मरम तुम्ह जानहु। तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु॥ कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला। कहहु कवन अघ परम कराला॥ ३ ॥
भावार्थ
संत और असंतका मर्म ( भेद ) आप जानते हैं, उनके सहज स्वभावका वर्णन कीजिये। फिर कहिये कि श्रुतियोंमें प्रसिद्ध सबसे महान् पुण्य कौन-सा है और सबसे महान् भयंकर पाप कौन है?॥३॥
मानस रोग कहहु समुझाई। तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई॥ तात सुनहु सादर अति प्रीती। मैं संछेप कहउँ यह नीती॥ ४ ॥
भावार्थ
फिर मानस-रोगोंको समझाकर कहिये। आप सर्वज्ञ हैं और मुझपर आपकी कृपा भी बहुत है। [ काकभुशुण्डिजीने कहा— ] हे तात! अत्यन्त आदर और प्रेमके साथ सुनिये। मैं यह नीति संक्षेपसे कहता हूँ॥४॥
नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥ नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥ ५ ॥
भावार्थ
मनुष्य-शरीरके समान कोई शरीर नहीं है। चर-अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं। यह मनुष्य-शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्षकी सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्तिको देनेवाला है॥५॥
सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर। होहिं विषय रत मंद मंद तर॥ काँच किरिच बदलें ते लेहीं। कर ते डारि परस मनि देहीं॥ ६ ॥
भावार्थ
ऐसे मनुष्य-शरीरको धारण ( प्राप्त ) करके भी जो लोग श्रीहरिका भजन नहीं करते और नीचसे भी नीच विषयोंमें अनुरक्त रहते हैं, वे पारसमणिको हाथसे फेंक देते हैं और बदलेमें काँचके टुकड़े ले लेते हैं॥६॥
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं॥ पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया॥ ७ ॥
भावार्थ
जगत्में दरिद्रताके समान दुःख नहीं है तथा संतोंके मिलनके समान जगत्में सुख नहीं है। और हे पक्षिराज! मन, वचन और शरीरसे परोपकार करना, यह संतोंका सहज स्वभाव है॥७॥
संत सहहिं दुख परहित लागी। पर दुख हेतु असंत अभागी॥ भूर्ज तरू सम संत कृपाला। पर हित निति सह बिपति बिसाला॥८॥
भावार्थ
संत दूसरोंकी भलाईके लिये दुःख सहते हैं और अभागे असंत दूसरोंको दुःख पहुँचानेके लिये। कृपालु संत भोजके वृक्षके समान दूसरोंके हितके लिये भारी विपत्ति सहते हैं ( अपनी खालतक उधड़वा लेते हैं )॥८॥
सन इव खल पर बंधन करई। खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई॥ खल बिनु स्वारथ पर अपकारी। अहि मूषक इव सुनु उरगारी॥९॥
भावार्थ
किन्तु दुष्ट लोग सनकी भाँति दूसरोंको बाँधते हैं और [ उन्हें बाँधनेके लिये ] अपनी खाल खिंचवाकर विपत्ति सहकर मर जाते हैं। हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! सुनिये; दुष्ट बिना किसी स्वार्थके साँप और चूहेके समान अकारण ही दूसरोंका अपकार करते हैं॥९॥
पर संपदा बिनासि नसाहीं। जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं॥ दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू॥१०॥
भावार्थ
वे परायी सम्पत्तिका नाश करके स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे खेतीका नाश करके ओले नष्ट हो जाते हैं। दुष्टका अभ्युदय ( उन्नति ) प्रसिद्ध अधम ग्रह केतुके उदयकी भाँति जगत्के दुःखके लिये ही होता है॥१०॥
संत उदय संतत सुखकारी। बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी॥ परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। पर निंदा सम अघ न गरीसा॥११॥
भावार्थ
और संतोंका अभ्युदय सदा ही सुखकर होता है, जैसे चन्द्रमा और सूर्यका उदय विश्वभरके लिये सुखदायक है। वेदोंमें अहिंसाको परम धर्म माना है और परनिन्दाके समान भारी पाप नहीं है॥११॥
हर गुर निंदक दादुर होई। जन्म सहस्र पाव तन सोई॥ द्विज निंदक बहु नरक भोग करि। जग जनमइ बायस सरीर धरि॥१२॥
भावार्थ
शंकरजी और गुरुकी निन्दा करनेवाला मनुष्य ( अगले जन्ममें ) मेढक होता है और वह हजार जन्मतक वही मेढकका शरीर पाता है। ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेवाला व्यक्ति बहुत-से नरक भोगकर फिर जगत्में कौएका शरीर धारण करके जन्म लेता है॥१२॥
सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी॥ होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत॥१३॥
भावार्थ
जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदोंकी निन्दा करते हैं, वे रौरव नरकमें पड़ते हैं। संतोंकी निन्दामें लगे हुए लोग उल्लू होते हैं, जिन्हें मोहरूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञानरूपी सूर्य जिनके लिये बीत गया ( अस्त हो गया ) रहता है॥१३॥
सब कै निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं॥ सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा॥१४॥
भावार्थ
जो मूर्ख मनुष्य सबकी निन्दा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं। हे तात! अब मानस-रोग सुनिये, जिनसे सब लोग दुःख पाया करते हैं॥१४॥
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥ काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा॥१५॥
भावार्थ
सब रोगोंकी जड़ मोह ( अज्ञान ) है। उन व्याधियोंसे फिर और बहुत-से शूल उत्पन्न होते हैं। काम वात है, लोभ अपार ( बढ़ा हुआ ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है॥१५॥
प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई॥ बिषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना॥१६॥
भावार्थ
यदि कहीं ये तीनों भाई ( वात, पित्त और कफ ) प्रीति कर लें ( मिल जायँ ) तो दुःखदायक सन्निपात रोग उत्पन्न होता है। कठिनतासे प्राप्त ( पूर्ण ) होनेवाले जो विषयोंके मनोरथ हैं, वे ही सब शूल ( कष्टदायक रोग ) हैं; उनके नाम कौन जानता है ( अर्थात् वे अपार हैं )॥१६॥
ममता दादु कंडु इरषाई। हरष बिषाद गरह बहुताई॥ पर सुख देखि जरनि सोइ छई। कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई॥१७॥
भावार्थ
ममता दाद है, ईर्ष्या ( डाह ) खुजली है, हर्ष-विषाद गलेके रोगोंकी अधिकता है ( गलगंड, कण्ठमाला या घेघा आदि रोग हैं ), पराये सुखको देखकर जो जलन होती है, वही क्षयी है। दुष्टता और मनकी कुटिलता ही कोढ़ है॥१७॥
अहंकार अति दुखद डमरुआ। दंभ कपट मद मान नेहरुआ॥ तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी। त्रिबिधि ईषना तरुन तिजारी॥१८॥
भावार्थ
अहंकार अत्यन्त दुःख देनेवाला डमरू ( गाँठका ) रोग है। दम्भ, कपट, मद और मान नहरुआ ( नसोंका ) रोग है। तृष्णा बड़ा भारी उदरवृद्धि ( जलोदर ) रोग है। तीन प्रकार ( पुत्र, धन और मान ) की प्रबल इच्छाएँ प्रबल तिजारी हैं॥१८॥
जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका। कहँ लगि कहौं कुरोग अनेका॥१९॥
भावार्थ
मत्सर और अविवेक दो प्रकारके ज्वर हैं। इस प्रकार अनेकों बुरे रोग हैं, जिन्हें कहाँतक कहूँ॥१९॥
एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि। पीड़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि॥१२१ (क)॥
भावार्थ
एक ही रोगके वश होकर मनुष्य मर जाते हैं, फिर ये तो बहुत-से असाध्य रोग हैं। ये जीवको निरन्तर कष्ट देते रहते हैं, ऐसी दशामें वह समाधि ( शान्ति ) को कैसे प्राप्त करे?॥१२१ ( क )॥
नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान। भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान॥१२१ (ख)॥
भावार्थ
नियम, धर्म, आचार ( उत्तम आचरण ), तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान तथा और भी करोड़ों ओषधियाँ हैं, परन्तु हे गरुड़जी! उनसे ये रोग नहीं जाते॥१२१ ( ख )॥
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