दोहा 120b
गरुड़जीके सात प्रश्न तथा काकभुशुण्डिके उत्तर
कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई। सुनहु भगति मनि कै प्रभुताई॥ राम भगति चिंतामनि सुंदर। बसइ गरुड़ जाके उर अंतर॥ १ ॥
भावार्थ
मैंने ज्ञानका सिद्धान्त समझाकर कहा। अब भक्तिरूपी मणिकी प्रभुता ( महिमा ) सुनिये। श्रीरामजीकी भक्ति सुन्दर चिन्तामणि है। हे गरुड़जी! यह जिसके हृदयके अंदर बसती है,॥१॥
परम प्रकास रूप दिन राती। नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती॥ मोह दरिद्र निकट नहिं आवा। लोभ बात नहिं ताहि बुझावा॥ २ ॥
भावार्थ
वह दिन-रात [ अपने-आप ही ] परम प्रकाशरूप रहता है। उसको दीपक, घी और बत्ती कुछ भी नहीं चाहिये। [ इस प्रकार मणिका एक तो स्वाभाविक प्रकाश रहता है ] फिर मोहरूपी दरिद्रता समीप नहीं आती [ क्योंकि मणि स्वयं धनरूप है ]; और [ तीसरे ] लोभरूपी हवा उस मणिमय दीपको बुझा नहीं सकती, [ क्योंकि मणि स्वयं प्रकाशरूप है, वह किसी दूसरेकी सहायतासे नहीं प्रकाश करती ]॥२॥
प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई। हारहिं सकल सलभ समुदाई॥ खल कामादि निकट नहिं जाहीं। बसइ भगति जाके उर माहीं॥ ३ ॥
भावार्थ
[ उसके प्रकाशसे ] अविद्याका प्रबल अन्धकार मिट जाता है। मदादि पतंगोंका सारा समूह हार जाता है। जिसके हृदयमें भक्ति बसती है, काम, क्रोध और लोभ आदि दुष्ट तो उसके पास भी नहीं जाते॥३॥
गरल सुधासम अरि हित होई। तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई॥ ब्यापहिं मानस रोग न भारी। जिन्ह के बस सब जीव दुखारी॥ ४ ॥
भावार्थ
उसके लिये विष अमृतके समान और शत्रु मित्र हो जाता है। उस मणिके बिना कोई सुख नहीं पाता। बड़े-बड़े मानस-रोग, जिनके वश होकर सब जीव दुःखी हो रहे हैं, उसको नहीं व्यापते॥४॥
राम भगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें॥ चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं। जे मनि लागि सुजतन कराहीं॥ ५ ॥
भावार्थ
श्रीरामभक्तिरूपी मणि जिसके हृदयमें बसती है, उसे स्वप्नमें भी लेशमात्र दुःख नहीं होता। जगत्में वे ही मनुष्य चतुरोंके शिरोमणि हैं जो उस भक्तिरूपी मणिके लिये भलीभाँति यत्न करते हैं॥५॥
सो मनि जदपि प्रगट जग अहई। राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई॥ सुगम उपाय पाइबे केरे। नर हतभाग्य देहिं भटभेरे॥ ६ ॥
भावार्थ
यद्यपि वह मणि जगत्में प्रकट ( प्रत्यक्ष ) है, पर बिना श्रीरामजीकी कृपाके उसे कोई पा नहीं सकता। उसके पानेके उपाय भी सुगम ही हैं पर अभागे मनुष्य उन्हें ठुकरा देते हैं॥६॥
पावन पर्बत बेद पुराना। राम कथा रुचिराकर नाना॥ मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ग्यान बिराग नयन उरगारी॥ ७ ॥
भावार्थ
वेद-पुराण पवित्र पर्वत हैं। श्रीरामजीकी नाना प्रकारकी कथाएँ उन पर्वतोंमें सुन्दर खानें हैं। संत पुरुष [ उनकी इन खानोंके रहस्यको जाननेवाले ] मर्मी हैं और सुन्दर बुद्धि [ खोदनेवाली ] कुदाल है। हे गरुड़जी! ज्ञान और वैराग्य—ये दो उनके नेत्र हैं॥७॥
भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी॥ मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा॥ ८ ॥
भावार्थ
जो प्राणी उसे प्रेमके साथ खोजता है, वह सब सुखोंकी खान इस भक्तिरूपी मणिको पा जाता है। हे प्रभो! मेरे मनमें तो ऐसा विश्वास है कि श्रीरामजीके दास श्रीरामजीसे भी बढ़कर हैं॥८॥
राम सिंधु घन सज्जन धीरा। चंदन तरु हरि संत समीरा॥ सब कर फल हरि भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहूँ पाई॥ ९ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजी समुद्र हैं तो धीर संत पुरुष मेघ हैं। श्रीहरि चन्दनके वृक्ष हैं तो संत पवन हैं। सब साधनोंका फल सुन्दर हरिभक्ति ही है। उसे संतके बिना किसीने नहीं पाया॥९॥
अस बिचारि जोइ कर सतसंगा। राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा॥ १० ॥
भावार्थ
ऐसा विचारकर जो भी संतोंका संग करता है, हे गरुड़जी! उसके लिये श्रीरामजीकी भक्ति सुलभ हो जाती है॥१०॥
ब्रह्म पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहिं। कथा सुधा मथि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं॥ १२० (क) ॥
भावार्थ
ब्रह्म ( वेद ) समुद्र है, ज्ञान मन्दराचल है और संत देवता हैं, जो उस समुद्रको मथकर कथारूपी अमृत निकालते हैं, जिसमें भक्तिरूपी मधुरता बसी रहती है॥१२०(क)॥
बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि। जय पाइअ सो हरि भगति देखु खगेस बिचारि॥ १२० (ख) ॥
भावार्थ
वैराग्यरूपी ढालसे अपनेको बचाते हुए और ज्ञानरूपी तलवारसे मद, लोभ और मोहरूपी वैरियोंको मारकर जो विजय प्राप्त करती है, वह हरिभक्ति ही है; हे पक्षिराज! इसे विचारकर देखिये॥१२०(ख)॥
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