दोहा 122b
रामायण-माहात्म्य, तुलसी-विनय और फलस्तुति
एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी॥ मानस रोग कछुक मैं गाए। हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए॥१॥
भावार्थ
इस प्रकार जगत्में समस्त जीव रोगी हैं, जो शोक, हर्ष, भय, प्रीति और वियोगके दुःखसे और भी दुःखी हो रहे हैं। मैंने ये थोड़े-से मानस-रोग कहे हैं। ये हैं तो सबको, परन्तु इन्हें जान पाये हैं कोई विरले ही॥१॥
जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिं जन परितापी॥ बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे॥२॥
भावार्थ
प्राणियोंको जलानेवाले ये पापी ( रोग ) जान लिये जानेसे कुछ क्षीण अवश्य हो जाते हैं, परन्तु नाशको नहीं प्राप्त होते। विषयरूप कुपथ्य पाकर ये मुनियोंके हृदयमें भी अंकुरित हो उठते हैं, तब बेचारे साधारण मनुष्य तो क्या चीज हैं॥२॥
राम कृपाँ नासहिं सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संयोगा॥ सदगुर बैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय कै आसा॥३॥
भावार्थ
यदि श्रीरामजीकी कृपासे इस प्रकारका संयोग बन जाय तो ये सब रोग नष्ट हो जायँ। सद्गुरुरूपी वैद्यके वचनमें विश्वास हो। विषयोंकी आशा न करे, यही संयम ( परहेज ) हो॥३॥
रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी॥ एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं॥४॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीकी भक्ति संजीवनी जड़ी है। श्रद्धासे पूर्ण बुद्धि ही अनुपान ( दवाके साथ लिया जानेवाला मधु आदि ) है। इस प्रकारका संयोग हो तो वे रोग भले ही नष्ट हो जायँ, नहीं तो करोड़ों प्रयत्नोंसे भी नहीं जाते॥४॥
जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई। जब उर बल बिराग अधिकाई॥ सुमति छुधा बाढ़इ नित नई। बिषय आस दुर्बलता गई॥५॥
भावार्थ
हे गोसाईं! मनको नीरोग हुआ तब जानना चाहिये, जब हृदयमें वैराग्यका बल बढ़ जाय, उत्तम बुद्धिरूपी भूख नित नयी बढ़ती रहे और विषयोंकी आशारूपी दुर्बलता मिट जाय॥५॥
बिमल ग्यान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छाई॥ सिव अज सुक सनकादिक नारद। जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद॥६॥
भावार्थ
[ इस प्रकार सब रोगोंसे छूटकर ] जब मनुष्य निर्मल ज्ञानरूपी जलमें स्नान कर लेता है, तब उसके हृदयमें रामभक्ति छा रहती है। शिवजी, ब्रह्माजी, शुकदेवजी, सनकादि और नारद आदि ब्रह्मविचारमें परम निपुण जो मुनि हैं,॥६॥
सब कर मत खगनायक एहा। करिअ राम पद पंकज नेहा॥ श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं। रघुपति भगति बिना सुख नाहीं॥७॥
भावार्थ
हे पक्षिराज! उन सबका मत यही है कि श्रीरामजीके चरणकमलोंमें प्रेम करना चाहिये। श्रुति, पुराण और सभी ग्रन्थ कहते हैं कि श्रीरघुनाथजीकी भक्तिके बिना सुख नहीं है॥७॥
कमठ पीठ जामहिं बरु बारा। बंध्यासुत बरु काहुहि मारा॥ फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला। जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला॥८॥
भावार्थ
कछुएकी पीठपर भले ही बाल उग आवें, बाँझका पुत्र भले ही किसीको मार डाले, आकाशमें भले ही अनेकों प्रकारके फूल खिल उठें; परन्तु श्रीहरिसे विमुख होकर जीव सुख नहीं प्राप्त कर सकता॥८॥
तृषा जाइ बरु मृगजल पाना। बरु जामहिं सस सीस बिषाना॥ अंधकारु बरु रबिहि नसावै। राम बिमुख न जीव सुख पावै॥९॥
भावार्थ
मृगतृष्णाके जलको पीनेसे भले ही प्यास बुझ जाय, खरगोशके सिरपर भले ही सींग निकल आवें, अन्धकार भले ही सूर्यका नाश कर दे; परन्तु श्रीरामसे विमुख होकर जीव सुख नहीं पा सकता॥९॥
हिम ते अनल प्रगट बरु होई। बिमुख राम सुख पाव न कोई॥१०॥
भावार्थ
बर्फसे भले ही अग्नि प्रकट हो जाय ( ये सब अनहोनी बातें चाहे हो जायँ ), परन्तु श्रीरामसे विमुख होकर कोई भी सुख नहीं पा सकता॥ १०॥
बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल। बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल॥१२२ (क)॥
भावार्थ
जलको मथनेसे भले ही घी उत्पन्न हो जाय और बालू [ को पेरने ] से भले ही तेल निकल आवे; परन्तु श्रीहरिके भजन बिना संसाररूपी समुद्रसे नहीं तरा जा सकता, यह सिद्धान्त अटल है॥ १२२ ( क )॥
मसकहि करइ बिरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन। अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन॥१२२ (ख)॥
भावार्थ
प्रभु मच्छरको ब्रह्मा कर सकते हैं और ब्रह्माको मच्छरसे भी तुच्छ बना सकते हैं। ऐसा विचारकर चतुर पुरुष सब सन्देह त्यागकर श्रीरामजीको ही भजते हैं॥ १२२ ( ख )॥
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