दोहा 117d
सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी॥ ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥१॥
भावार्थ
हे तात! यह अकथनीय कहानी ( वार्ता ) सुनिये। यह समझते ही बनती है, कही नहीं जा सकती। जीव ईश्वरका अंश है। [ अतएव ] वह अविनाशी, चेतन, निर्मल और स्वभावसे ही सुखकी राशि है॥ १ ॥
सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं॥ जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥२॥
भावार्थ
हे गोसाईं! वह मायाके वशीभूत होकर तोते और वानरकी भाँति अपने-आप ही बँध गया। इस प्रकार जड़ और चेतनमें ग्रन्थि ( गाँठ ) पड़ गयी। यद्यपि वह ग्रन्थि मिथ्या ही है, तथापि उसके छूटनेमें कठिनता है॥ २ ॥
तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी॥ श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई॥३॥
भावार्थ
तभीसे जीव संसारी ( जन्मने-मरनेवाला ) हो गया। अब न तो गाँठ छूटती है और न वह सुखी होता है। वेदों और पुराणोंने बहुत-से उपाय बतलाये हैं। पर वह ( ग्रन्थि ) छूटती नहीं वरं अधिकाधिक उलझती ही जाती है॥ ३ ॥
जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी। ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी॥ अस संजोग ईस जब करई। तबहुँ कदाचित सो निरुअरई॥४॥
भावार्थ
जीवके हृदयमें अज्ञानरूपी अन्धकार विशेषरूपसे छा रहा है, इससे गाँठ देख ही नहीं पड़ती, छूटे तो कैसे? जब कभी ईश्वर ऐसा संयोग ( जैसा आगे कहा जाता है ) उपस्थित कर देते हैं तब भी कदाचित् ही वह ( ग्रन्थि ) छूट पाती है॥ ४॥
सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई। जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई॥ जप तप ब्रत जम नियम अपारा। जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा॥५॥
भावार्थ
श्रीहरिकी कृपासे यदि सात्त्विकी श्रद्धारूपी सुन्दर गौ हृदयरूपी घरमें आकर बस जाय; असंख्यों जप, तप, व्रत, यम और नियमादि शुभ धर्म और आचार ( आचरण ), जो श्रुतियोंने कहे हैं,॥ ५ ॥
तेइ तृन हरित चरै जब गाई। भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई॥ नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा। निर्मल मन अहीर निज दासा॥६॥
भावार्थ
उन्हीं [ धर्माचाररूपी ] हरे तृणों ( घास )को जब वह गौ चरे और आस्तिक भावरूपी छोटे बछड़ेको पाकर वह पेन्हावे। निवृत्ति ( सांसारिक विषयोंसे और प्रपञ्चसे हटना ) नोई ( गौके दूहते समय पिछले पैर बाँधनेकी रस्सी ) है, विश्वास [ दूध दूहनेका ] बरतन है, निर्मल ( निष्पाप ) मन जो स्वयं अपना दास है ( अपने वशमें है ), दुहनेवाला अहीर है॥ ६ ॥
परम धर्ममय पय दुहि भाई। अवटै अनल अकाम बनाई॥ तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै। धृति सम जावनु देइ जमावै॥७॥
भावार्थ
हे भाई! इस प्रकार ( धर्माचारमें प्रवृत्त सात्त्विकी श्रद्धारूपी गौसे भाव, निवृत्ति और वशमें किये हुए निर्मल मनकी सहायतासे ) परम धर्ममय दूध दुहकर उसे निष्काम भावरूपी अग्निपर भलीभाँति औटावे। फिर क्षमा और संतोषरूपी हवासे उसे ठंढा करे और धैर्य तथा शम ( मनका निग्रह )-रूपी जामन देकर उसे जमावे॥ ७॥
मुदिताँ मथै बिचार मथानी। दम अधार रजु सत्य सुबानी॥ तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता। बिमल बिराग सुभग सुपुनीता॥८॥
भावार्थ
तब मुदिता ( प्रसन्नता ) रूपी कमोरीमें, तत्त्वविचाररूपी मथानीसे दम ( इन्द्रिय-दमन ) के आधारपर ( दमरूपी खंभे आदिके सहारे ) सत्य और सुन्दर वाणीरूपी रस्सी लगाकर उसे मथे और मथकर तब उसमेंसे निर्मल, सुन्दर और अत्यन्त पवित्र वैराग्यरूपी मक्खन निकाल ले॥८॥
जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ। बुद्धि सिरावै ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ॥११७(क)॥
भावार्थ
तब योगरूपी अग्नि प्रकट करके उसमें समस्त शुभाशुभ कर्मरूपी ईंधन लगा दे ( सब कर्मोंको योगरूपी अग्निमें भस्म कर दे )। जब [ वैराग्यरूपी मक्खनका ] ममतारूपी मल जल जाय, तब [ बचे हुए ] ज्ञानरूपी घीको [ निश्चयात्मिका ] बुद्धिसे ठंढा करे॥ ११७ ( क )॥
तब बिग्यानरूपिनी बुद्धि बिसद घृत पाइ। चित्त दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ॥११७(ख)॥
भावार्थ
तब विज्ञानरूपिणी बुद्धि उस [ ज्ञानरूपी ] निर्मल घीको पाकर उससे चित्तरूपी दियेको भरकर, समताकी दीवट बनाकर, उसपर उसे दृढ़तापूर्वक ( जमाकर ) रखे॥११७(ख)॥
तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि। तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि॥११७(ग)॥
भावार्थ
[ जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति ] तीनों अवस्थाएँ और [ सत्त्व, रज और तम ] तीनों गुणरूपी कपाससे तुरीयावस्थारूपी रूईको निकालकर और फिर उसे सँवारकर उसकी सुन्दर कड़ी बत्ती बनावे॥११७(ग)॥
एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय। जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब॥११७(घ)॥
भावार्थ
इस प्रकार तेजकी राशि विज्ञानमय दीपकको जलावे, जिसके समीप जाते ही मद आदि सब पतंगे जल जायँ॥११७(घ)॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें