दोहा 116b
इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ। बेद पुरान संत मत भाषउँ॥ मोह न नारि नारि कें रूपा। पन्नगारि यह रीति अनूपा॥१॥
भावार्थ
यहाँ मैं कुछ पक्षपात नहीं रखता। वेद, पुराण और संतोंका मत ( सिद्धान्त ) ही कहता हूँ। हे गरुड़जी! यह अनुपम ( विलक्षण ) रीति है कि एक स्त्रीके रूपपर दूसरी स्त्री मोहित नहीं होती॥ १ ॥
माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ। नारि बर्ग जानइ सब कोऊ॥ पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी। माया खलु नर्तकी बिचारी॥२॥
भावार्थ
आप सुनिये, माया और भक्ति—ये दोनों ही स्त्रीवर्गकी हैं, यह सब कोई जानते हैं। फिर श्रीरघुवीरको भक्ति प्यारी है। माया बेचारी तो निश्चय ही नाचनेवाली ( नटिनीमात्र ) है॥ २ ॥
भगतिहि सानुकूल रघुराया। ताते तेहि डरपति अति माया॥ राम भगति निरुपम निरुपाधी। बसइ जासु उर सदा अबाधी॥३॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजी भक्तिके विशेष अनुकूल रहते हैं। इसीसे माया उससे अत्यन्त डरती रहती है। जिसके हृदयमें उपमारहित और उपाधिरहित ( विशुद्ध ) रामभक्ति सदा बिना किसी बाधा ( रोक-टोक ) के बसती है;॥ ३ ॥
तेहि बिलोकि माया सकुचाई। करि न सकइ कछु निज प्रभुताई॥ अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी। जाचहिं भगति सकल सुख खानी॥४॥
भावार्थ
उसे देखकर माया सकुचा जाती है। उसपर वह अपनी प्रभुता कुछ भी नहीं कर ( चला ) सकती। ऐसा विचारकर ही जो विज्ञानी मुनि हैं, वे भी सब सुखोंकी खान भक्तिकी ही याचना करते हैं॥ ४॥
यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न जानइ कोइ। जो जानइ रघुपति कृपाँ सपनेहुँ मोह न होइ॥११६(क)॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीका यह रहस्य ( गुप्त मर्म ) जल्दी कोई भी नहीं जान पाता। श्रीरघुनाथजीकी कृपासे जो इसे जान जाता है, उसे स्वप्नमें भी मोह नहीं होता॥ ११६ ( क )॥
औरउ ग्यान भगति कर भेद सुनहु सुप्रबीन। जो सुनि होइ राम पद प्रीति सदा अबिछीन॥११६(ख)॥
भावार्थ
हे सुचतुर गरुड़जी! ज्ञान और भक्तिका और भी भेद सुनिये, जिसके सुननेसे श्रीरामजीके चरणोंमें सदा अविच्छिन्न ( एकतार ) प्रेम हो जाता है॥ ११६ ( ख )॥
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