दोहा 115b
ज्ञान-भक्ति-निरूपण, ज्ञानदीपक और भक्तिकी महान् महिमा
जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं॥ ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी॥१॥
भावार्थ
जो भक्तिकी ऐसी महिमा जानकर भी उसे छोड़ देते हैं और केवल ज्ञानके लिये श्रम ( साधन ) करते हैं, वे मूर्ख घरपर खड़ी हुई कामधेनुको छोड़कर दूधके लिये मदारके पेड़को खोजते फिरते हैं॥१॥
सुनु खगेस हरि भगति बिहाई। जे सुख चाहहिं आन उपाई॥ ते सठ महासिंधु बिनु तरनी। पैरि पार चाहहिं जड़ करनी॥२॥
भावार्थ
हे पक्षिराज! सुनिये, जो लोग श्रीहरिकी भक्तिको छोड़कर दूसरे उपायोंसे सुख चाहते हैं, वे मूर्ख और जड़ करनीवाले ( अभागे ) बिना ही जहाजके तैरकर महासमुद्रके पार जाना चाहते हैं॥ २ ॥
सुनि भसुंडि के बचन भवानी। बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी॥ तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं। संसय सोक मोह भ्रम नाहीं॥३॥
भावार्थ
[ शिवजी कहते हैं— ] हे भवानी! भुशुण्डिके वचन सुनकर गरुड़जी हर्षित होकर कोमल वाणीसे बोले—हे प्रभो! आपके प्रसादसे मेरे हृदयमें अब सन्देह, शोक, मोह और भ्रम कुछ भी नहीं रह गया॥ ३ ॥
सुनेउँ पुनीत राम गुन ग्रामा। तुम्हरी कृपाँ लहेउँ बिश्रामा॥ एक बात प्रभु पूँछउँ तोही। कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही॥४॥
भावार्थ
मैंने आपकी कृपासे श्रीरामचन्द्रजीके पवित्र गुणसमूहोंको सुना और शान्ति प्राप्त की। हे प्रभो! अब मैं आपसे एक बात और पूछता हूँ। हे कृपासागर! मुझे समझाकर कहिये॥ ४॥
कहहिं संत मुनि बेद पुराना। नहिं कछु दुर्लभ ग्यान समाना॥ सोइ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाईं। नहिं आदरेहु भगति की नाईं॥५॥
भावार्थ
संत, मुनि, वेद और पुराण यह कहते हैं कि ज्ञानके समान दुर्लभ कुछ भी नहीं है। हे गोसाईं! वही ज्ञान मुनिने आपसे कहा, परन्तु आपने भक्तिके समान उसका आदर नहीं किया॥ ५ ॥
ग्यानहि भगतिहि अंतर केता। सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता॥ सुनि उरगारि बचन सुख माना। सादर बोलेउ काग सुजाना॥६॥
भावार्थ
हे कृपाके धाम! हे प्रभो! ज्ञान और भक्तिमें कितना अन्तर है? यह सब मुझसे कहिये। गरुड़जीके वचन सुनकर सुजान काकभुशुण्डिजीने सुख माना और आदरके साथ कहा—॥ ६॥
भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा॥ नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर। सावधान सोउ सुनु बिहंगबर॥७॥
भावार्थ
भक्ति और ज्ञानमें कुछ भी भेद नहीं है। दोनों ही संसारसे उत्पन्न क्लेशोंको हर लेते हैं। हे नाथ! मुनीश्वर इनमें कुछ अन्तर बतलाते हैं। हे पक्षिश्रेष्ठ! उसे सावधान होकर सुनिये॥ ७॥
ग्यान बिराग जोग बिग्याना। ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना॥ पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती। अबला अबल सहज जड़ जाती॥८॥
भावार्थ
हे हरिवाहन! सुनिये; ज्ञान, वैराग्य, योग, विज्ञान—ये सब पुरुष हैं; पुरुषका प्रताप सब प्रकारसे प्रबल होता है। अबला ( माया ) स्वाभाविक ही निर्बल और जाति ( जन्म ) से ही जड़ ( मूर्ख ) होती है॥ ८॥
पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर। न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर॥११५(क)॥
भावार्थ
परन्तु जो वैराग्यवान् और धीरबुद्धि पुरुष हैं वही स्त्रीको त्याग सकते हैं, न कि वे कामी पुरुष, जो विषयोंके वशमें हैं ( उनके गुलाम हैं ) और श्रीरघुवीरके चरणोंसे विमुख हैं॥ ११५ ( क )॥
सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि। बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट॥११५(ख)॥
भावार्थ
वे ज्ञानके भण्डार मुनि भी मृगनयनी ( युवती स्त्री ) के चन्द्रमुखको देखकर विवश ( उसके अधीन ) हो जाते हैं। हे गरुड़जी! साक्षात् भगवान् विष्णुकी माया ही स्त्रीरूपसे प्रकट है॥ ११५ ( ख )॥
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