दोहा 118b
सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥ आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥१॥
भावार्थ
‘सोऽहमस्मि’ ( वह ब्रह्म मैं हूँ ) यह जो अखण्ड ( तैलधारावत् कभी न टूटनेवाली ) वृत्ति है वही [ उस ज्ञानदीपककी ] परम प्रचण्ड दीपशिखा ( लौ ) है। [ इस प्रकार ] जब आत्मानुभवके सुखका सुन्दर प्रकाश फैलता है, तब संसारके मूल भेदरूपी भ्रमका नाश हो जाता है,॥१॥
प्रबल अबिद्या कर परिवारा। मोह आदि तम मिटइ अपारा॥ तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा। उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा॥२॥
भावार्थ
और महान् बलवती अविद्याके परिवार मोह आदिका अपार अन्धकार मिट जाता है। तब वही ( विज्ञानरूपिणी ) बुद्धि [ आत्मानुभवरूप ] प्रकाशको पाकर हृदयरूपी घरमें बैठकर उस जड़-चेतनकी गाँठको खोलती है॥२॥
छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई। तब यह जीव कृतारथ होई॥ छोरत ग्रंथि जानि खगराया। बिघ्न अनेक करइ तब माया॥३॥
भावार्थ
यदि वह ( विज्ञानरूपिणी बुद्धि ) उस गाँठको खोलने पावे, तब यह जीव कृतार्थ हो। परन्तु हे पक्षिराज गरुड़जी! गाँठ खोलते हुए जानकर माया फिर अनेकों विघ्न करती है॥३॥
रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई। बुद्धिहि लोभ दिखावहिं आई॥ कल बल छल करि जाहिं समीपा। अंचल बात बुझावहिं दीपा॥४॥
भावार्थ
हे भाई! वह बहुत-सी ऋद्धि-सिद्धियोंको भेजती है, जो आकर बुद्धिको लोभ दिखाती हैं। और वे ऋद्धि-सिद्धियाँ कल ( कला ), बल और छल करके समीप जाती और आँचलकी वायुसे उस ज्ञानरूपी दीपकको बुझा देती हैं॥४॥
होइ बुद्धि जौं परम सयानी। तिन्ह तन चितव न अनहित जानी॥ जौं तेहि बिघ्न बुद्धि नहिं बाधी। तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी॥५॥
भावार्थ
यदि बुद्धि बहुत ही सयानी हुई, तो वह उन ( ऋद्धि-सिद्धियों ) को अहितकर ( हानिकर ) समझकर उनकी ओर ताकती नहीं। इस प्रकार यदि मायाके विघ्नोंसे बुद्धिको बाधा न हुई, तो फिर देवता उपाधि ( विघ्न ) करते हैं॥५॥
इंद्री द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना॥ आवत देखहिं बिषय बयारी। ते हठि देहिं कपाट उघारी॥६॥
भावार्थ
इन्द्रियोंके द्वार हृदयरूपी घरके अनेकों झरोखे हैं। वहाँ-वहाँ ( प्रत्येक झरोखेपर ) देवता थाना किये ( अड्डा जमाकर ) बैठे हैं। ज्यों ही वे विषयरूपी हवाको आते देखते हैं त्यों ही हठपूर्वक किवाड़ खोल देते हैं॥६॥
जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई। तबहिं दीप बिग्यान बुझाई॥ ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा। बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा॥७॥
भावार्थ
ज्यों ही वह तेज हवा हृदयरूपी घरमें जाती है, त्यों ही वह विज्ञानरूपी दीपक बुझ जाता है। गाँठ भी नहीं छूटी और वह ( आत्मानुभवरूप ) प्रकाश भी मिट गया। विषयरूपी हवासे बुद्धि व्याकुल हो गयी ( सारा किया-कराया चौपट हो गया )॥७॥
इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई। बिषय भोग पर प्रीति सदाई॥ बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी। तेहि बिधि दीप को बार बहोरी॥८॥
भावार्थ
इन्द्रियों और उनके देवताओंको ज्ञान [ स्वाभाविक ही ] नहीं सुहाता; क्योंकि उनकी विषय-भोगोंमें सदा ही प्रीति रहती है और बुद्धिको भी विषयरूपी हवाने बावली बना दिया। तब फिर ( दुबारा ) उस ज्ञानदीपकको उसी प्रकारसे कौन जलावे?॥८॥
तब फिरि जीव बिबिधि बिधि पावइ संसृति क्लेस। हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस॥११८(क)॥
भावार्थ
[ इस प्रकार ज्ञानदीपकके बुझ जानेपर ] तब फिर जीव अनेकों प्रकारसे संसृति ( जन्म-मरणादि ) के क्लेश पाता है। हे पक्षिराज! हरिकी माया अत्यन्त दुस्तर है, वह सहजहीमें तरी नहीं जा सकती॥११८(क)॥
कहत कठिन समुझत कठिन साधत कठिन बिबेक। होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक॥११८(ख)॥
भावार्थ
ज्ञान कहने ( समझाने ) में कठिन, समझनेमें कठिन और साधनेमें भी कठिन है। यदि घुणाक्षरन्यायसे ( संयोगवश ) कदाचित् यह ज्ञान हो भी जाय, तो फिर [ उसे बचाये रखनेमें ] अनेकों विघ्न हैं॥११८(ख)॥
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