दोहा 10b
प्रभु जानी कैकई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी॥ ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा॥१॥
भावार्थ
[ शिवजी कहते हैं— ] हे भवानी! प्रभुने जान लिया कि माता कैकेयी लज्जित हो गयी हैं। [ इसलिये ] वे पहले उन्हींके महलको गये और उन्हें समझा-बुझाकर बहुत सुख दिया। फिर श्रीहरिने अपने महलको गमन किया॥ १ ॥
कृपासिंधु जब मंदिर गए। पुर नर नारि सुखी सब भए॥ गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई। आजु सुघरी सुदिन समुदाई॥२॥
भावार्थ
कृपाके समुद्र श्रीरामजी जब अपने महलको गये, तब नगरके स्त्री-पुरुष सब सुखी हुए। गुरु वसिष्ठजीने ब्राह्मणोंको बुला लिया [ और कहा— ] आज शुभ घड़ी, सुन्दर दिन आदि सभी शुभ योग हैं॥ २ ॥
सब द्विज देहु हरषि अनुसासन। रामचंद्र बैठहिं सिंघासन॥ मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए। सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए॥३॥
भावार्थ
आप सब ब्राह्मण हर्षित होकर आज्ञा दीजिये, जिसमें श्रीरामचन्द्रजी सिंहासनपर विराजमान हों। वसिष्ठ मुनिके सुहावने वचन सुनते ही सब ब्राह्मणोंको बहुत ही अच्छे लगे॥ ३ ॥
कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका। जग अभिराम राम अभिषेका॥ अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजै। महाराज कहँ तिलक करीजै॥४॥
भावार्थ
वे सब अनेकों ब्राह्मण कोमल वचन कहने लगे कि श्रीरामजीका राज्याभिषेक सम्पूर्ण जगत्को आनन्द देनेवाला है। हे मुनिश्रेष्ठ! अब विलम्ब न कीजिये और महाराजका तिलक शीघ्र कीजिये॥ ४ ॥
तब मुनि कहेउ सुमंत्र सन सुनत चलेउ हरषाइ। रथ अनेक बहु बाजि गज तुरत सँवारे जाइ॥१० (क)॥
भावार्थ
तब मुनिने सुमन्त्रजीसे कहा, वे सुनते ही हर्षित होकर चले। उन्होंने तुरंत ही जाकर अनेकों रथ, घोड़े और हाथी सजाये;॥ १० ( क ) ॥
जहँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ। हरष समेत बसिष्ट पद पुनि सिरु नायउ आइ॥१० (ख)॥
भावार्थ
और जहाँ-तहाँ [ सूचना देनेवाले ] दूतोंको भेजकर माङ्गलिक वस्तुएँ मँगाकर फिर हर्षके साथ आकर वसिष्ठजीके चरणोंमें सिर नवाया॥ १० ( ख ) ॥
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