Ramayana.com

दोहा 9b

चौ०

कंचन कलस बिचित्र सँवारे। सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे॥ बंदनवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू॥१॥

भावार्थ

सोनेके कलशोंको विचित्र रीतिसे [ मणि-रत्नादिसे ] अलंकृत कर और सजाकर सब लोगोंने अपने-अपने दरवाजोंपर रख लिया। सब लोगोंने मङ्गलके लिये बंदनवार, ध्वजा और पताकाएँ लगायीं॥ १ ॥

चौ०

बीथीं सकल सुगंध सिंचाईं। गजमनि रचि बहु चौक पुराईं॥ नाना भाँति सुमंगल साजे। हरषि नगर निसान बहु बाजे॥२॥

भावार्थ

सारी गलियाँ सुगन्धित द्रवोंसे सिंचायी गयीं। गजमुक्ताओंसे रचकर बहुत-सी चौकें पुरायी गयीं। अनेकों प्रकारके सुन्दर मङ्गल-साज सजाये गये और हर्षपूर्वक नगरमें बहुत-से डंके बजने लगे॥ २ ॥

चौ०

जहँ तहँ नारि निछावरि करहीं। देहिं असीस हरष उर भरहीं॥ कंचन थार आरतीं नाना। जुबतीं सजें करहिं सुभ गाना॥३॥

भावार्थ

स्त्रियाँ जहाँ-तहाँ निछावर कर रही हैं, और हृदयमें हर्षित होकर आशीर्वाद देती हैं। बहुत-सी युवती [ सौभाग्यवती ] स्त्रियाँ सोनेके थालोंमें अनेकों प्रकारकी आरती सजकर मङ्गलगान कर रही हैं॥ ३ ॥

चौ०

करहिं आरती आरतिहर कें। रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें॥ पुर सोभा संपति कल्याना। निगम सेष सारदा बखाना॥४॥

भावार्थ

वे आर्तिहर ( दुःखोंको हरनेवाले ) और सूर्यकुलरूपी कमलवनके प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य श्रीरामजीकी आरती कर रही हैं। नगरकी शोभा, सम्पत्ति और कल्याणका वेद, शेषजी और सरस्वतीजी वर्णन करते हैं— ॥ ४ ॥

चौ०

तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं। उमा तासु गुन नर किमि कहहीं॥५॥

भावार्थ

परन्तु वे भी यह चरित्र देखकर ठगे-से रह जाते हैं ( स्तम्भित हो रहते हैं )। [ शिवजी कहते हैं— ] हे उमा! तब भला मनुष्य उनके गुणोंको कैसे कह सकते हैं॥ ५ ॥

दो०

नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस। अस्त भएँ बिगसत भईं निरखि राम राकेस॥९ (क)॥

भावार्थ

स्त्रियाँ कुमुदिनी हैं, अयोध्या सरोवर है और श्रीरघुनाथजीका विरह सूर्य है [ इस विरह-सूर्यके तापसे वे मुरझा गयी थीं ]। अब उस विरहरूपी सूर्यके अस्त होनेपर श्रीरामरूपी पूर्णचन्द्रको निरखकर वे खिल उठीं॥ ९ ( क ) ॥

दो०

होहिं सगुन सुभ बिबिध बिधि बाजहिं गगन निसान। पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान॥९ (ख)॥

भावार्थ

अनेक प्रकारके शुभ शकुन हो रहे हैं, आकाशमें नगाड़े बज रहे हैं। नगरके पुरुषों और स्त्रियोंको सनाथ ( दर्शनद्वारा कृतार्थ ) करके भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजी महलको चले॥ ९ ( ख ) ॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें