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दोहा 32

चौ०

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना॥ बचन कायँ मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही॥१॥

भावार्थ

सीताजीका दुःख सुनकर सुखके धाम प्रभुके कमलनेत्रोंमें जल भर आया [ और वे बोले— ] मन, वचन और शरीरसे जिसे मेरी ही गति ( मेरा ही आश्रय ) है, उसे क्या स्वप्नमें भी विपत्ति हो सकती है?॥ १ ॥

चौ०

कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥ केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी॥२॥

भावार्थ

हनुमान्‌जीने कहा—हे प्रभो! विपत्ति तो वही ( तभी ) है जब आपका भजन-स्मरण न हो। हे प्रभो! राक्षसोंकी बात ही कितनी है? आप शत्रुको जीतकर जानकीजीको ले आवेंगे॥ २ ॥

चौ०

सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥ प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥३॥

भावार्थ

[ भगवान् कहने लगे— ] हे हनुमान्! सुन; तेरे समान मेरा उपकारी देवता, मनुष्य अथवा मुनि कोई भी शरीरधारी नहीं है। मैं तेरा प्रत्युपकार ( बदलेमें उपकार ) तो क्या करूँ, मेरा मन भी तेरे सामने नहीं हो सकता॥ ३ ॥

चौ०

सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥ पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता॥४॥

भावार्थ

हे पुत्र! सुन; मैंने मनमें [ खूब ] विचार करके देख लिया कि मैं तुझसे उऋण नहीं हो सकता। देवताओंके रक्षक प्रभु बार-बार हनुमान्‌जीको देख रहे हैं। नेत्रोंमें प्रेमाश्रुओंका जल भरा है और शरीर अत्यन्त पुलकित है॥ ४॥

दो०

सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत। चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत॥३२॥

भावार्थ

प्रभुके वचन सुनकर और उनके [ प्रसन्न ] मुख तथा [ पुलकित ] अंगोंको देखकर हनुमान्‌जी हर्षित हो गये और प्रेममें विकल होकर ‘हे भगवन्! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो’ कहते हुए श्रीरामजीके चरणोंमें गिर पड़े॥ ३२ ॥

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