दोहा 31
चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥ नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी॥१॥
भावार्थ
चलते समय उन्होंने मुझे चूड़ामणि [ उतारकर ] दी। श्रीरघुनाथजीने उसे लेकर हृदयसे लगा लिया। [ हनुमान्जीने फिर कहा— ] हे नाथ! दोनों नेत्रोंमें जल भरकर जानकीजीने मुझसे कुछ वचन कहे—॥ १ ॥
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥ मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी॥२॥
भावार्थ
छोटे भाईसमेत प्रभुके चरण पकड़ना [ और कहना कि ] आप दीनबन्धु हैं, शरणागतके दुःखोंको हरनेवाले हैं और मैं मन, वचन और कर्मसे आपके चरणोंकी अनुरागिणी हूँ। फिर स्वामी ( आप ) ने मुझे किस अपराधसे त्याग दिया?॥ २ ॥
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥ नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करहिं हठि बाधा॥३॥
भावार्थ
[ हाँ ] एक दोष मैं अपना [ अवश्य ] मानती हूँ कि आपका वियोग होते ही मेरे प्राण नहीं चले गये। किन्तु हे नाथ! यह तो नेत्रोंका अपराध है जो प्राणोंके निकलनेमें हठपूर्वक बाधा देते हैं॥ ३ ॥
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥ नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी॥४॥
भावार्थ
विरह अग्नि है, शरीर रूई है और श्वास पवन है; इस प्रकार [ अग्नि और पवनका संयोग होनेसे ] यह शरीर क्षणमात्रमें जल सकता है। परन्तु नेत्र अपने हितके लिये ( प्रभुका स्वरूप देखकर सुखी होनेके लिये ) जल ( आँसू ) बरसाते हैं, जिससे विरहकी आगसे भी देह जलने नहीं पाती॥ ४ ॥
सीता कै अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला॥५॥
भावार्थ
सीताजीकी विपत्ति बहुत बड़ी है। हे दीनदयालु! वह बिना कही ही अच्छी है ( कहनेसे आपको बड़ा क्लेश होगा )॥ ५ ॥
निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति। बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति॥३१॥
भावार्थ
हे करुणानिधान! उनका एक-एक पल कल्पके समान बीतता है। अतः हे प्रभु! तुरंत चलिये और अपनी भुजाओंके बलसे दुष्टोंके दलको जीतकर सीताजीको ले आइये॥ ३१ ॥
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