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दोहा 73

चौ०

सक्ति सूल तरवारि कृपाना। अस्त्र सस्त्र कुलिसायुध नाना॥ डारइ परसु परिघ पाषाना। लागेउ बृष्टि करै बहु बाना॥१॥

भावार्थ

वह शक्ति, शूल, तलवार, कृपाण आदि अस्त्र, शस्त्र एवं वज्र आदि बहुत-से आयुध चलाने तथा फरसे, परिघ, पत्थर आदि डालने और बहुत-से बाणोंकी वृष्टि करने लगा॥ १ ॥

चौ०

दस दिसि रहे बान नभ छाई। मानहुँ मघा मेघ झरि लाई॥ धरु धरु मारु सुनिअ धुनि काना। जो मारइ तेहि कोउ न जाना॥२॥

भावार्थ

आकाशमें दसों दिशाओंमें बाण छा गये, मानो मघा नक्षत्रके बादलोंने झड़ी लगा दी हो। ‘पकड़ो, पकड़ो, मारो’ ये शब्द कानोंसे सुनायी पड़ते हैं। पर जो मार रहा है उसे कोई नहीं जान पाता॥ २ ॥

चौ०

गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं। देखहिं तेहि न दुखित फिरि आवहिं॥ अवघट घाट बाट गिरि कंदर। माया बल कीन्हेसि सर पंजर॥३॥

भावार्थ

पर्वत और वृक्षोंको लेकर वानर आकाशमें दौड़कर जाते हैं। पर उसे देख नहीं पाते, इससे दुःखी होकर लौट आते हैं—मेघनादने मायाके बलसे अटपटी घाटियों, रास्तों और पर्वत-कन्दराओंको बाणोंके पिंजरे बना दिये ( बाणोंसे छा दिया )॥ ३ ॥

चौ०

जाहिं कहाँ ब्याकुल भए बंदर। सुरपति बंदि परे जनु मंदर॥ मारुतसुत अंगद नल नीला। कीन्हेसि बिकल सकल बलसीला॥४॥

भावार्थ

अब कहाँ जायँ, यह सोचकर ( रास्ता न पाकर ) वानर व्याकुल हो गये। मानो पर्वत इन्द्रकी कैदमें पड़े हों। मेघनादने मारुति हनुमान्‌, अंगद, नल और नील आदि सभी बलवानोंको व्याकुल कर दिया॥४॥

चौ०

पुनि लछिमन सुग्रीव बिभीषन। सरन्हि मारि कीन्हेसि जर्जर तन॥ पुनि रघुपति सैं जूझै लागा। सर छाँड़इ होइ लागहिं नागा॥५॥

भावार्थ

फिर उसने लक्ष्मणजी, सुग्रीव और विभीषणको बाणोंसे मारकर उनके शरीरोंको चलनी कर दिया। फिर वह श्रीरघुनाथजीसे लड़ने लगा। वह जो बाण छोड़ता है, वे साँप होकर लगते हैं॥५॥

चौ०

ब्याल पास बस भए खरारी। स्वबस अनंत एक अबिकारी॥ नट इव कपट चरित कर नाना। सदा स्वतंत्र एक भगवाना॥६॥

भावार्थ

जो स्वतन्त्र, अनन्त, एक ( अखण्ड ) और निर्विकार हैं, वे खरके शत्रु श्रीरामजी [ लीलासे ] नागपाशके वशमें हो गये ( उससे बँध गये )। श्रीरामचन्द्रजी सदा स्वतन्त्र, एक, ( अद्वितीय ) भगवान्‌ हैं। वे नटकी तरह अनेकों प्रकारके दिखावटी चरित्र करते हैं॥६॥

चौ०

रन सोभा लगि प्रभुहिं बँधायो। नागपास देवन्ह भय पायो॥७॥

भावार्थ

रणकी शोभाके लिये प्रभुने अपनेको नागपाशमें बँधा लिया; किन्तु उससे देवताओंको बड़ा भय हुआ॥७॥

दो०

गिरिजा जासु नाम जपि मुनि काटहिं भव पास। सो कि बंध तर आवइ ब्यापक बिस्व निवास॥७३॥

भावार्थ

[ शिवजी कहते हैं— ] हे गिरिजे! जिनका नाम जपकर मुनि भव ( जन्म-मृत्यु ) की फाँसीको काट डालते हैं, वे सर्वव्यापक और विश्वनिवास ( विश्वके आधार ) प्रभु कहीं बन्धनमें आ सकते हैं?॥७३॥

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