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दोहा 72

चौ०

दिन कें अंत फिरीं द्वौ अनी। समर भई सुभटन्ह श्रम घनी॥ राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा। जिमि तृन पाइ लाग अति डाढ़ा॥१॥

भावार्थ

दिनका अन्त होनेपर दोनों सेनाएँ लौट पड़ीं। [ आजके युद्धमें ] योद्धाओंको बड़ी थकावट हुई; परन्तु श्रीरामजीकी कृपासे वानरसेनाका बल उसी प्रकार बढ़ गया जैसे घास पाकर अग्नि बहुत बढ़ जाती है॥ १ ॥

चौ०

छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती। निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती॥ बहु बिलाप दसकंधर करई। बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई॥२॥

भावार्थ

उधर राक्षस दिन-रात इस प्रकार घटते जा रहे हैं जिस प्रकार अपने ही मुखसे कहनेपर पुण्य घट जाते हैं। रावण बहुत विलाप कर रहा है। बार-बार भाई ( कुम्भकर्ण ) का सिर कलेजेसे लगाता है॥ २ ॥

चौ०

रोवहिं नारि हृदय हति पानी। तासु तेज बल बिपुल बखानी॥ मेघनाद तेहि अवसर आयउ। कहि बहु कथा पिता समुझायउ॥३॥

भावार्थ

स्त्रियाँ उसके बड़े भारी तेज और बलको बखान करके हाथोंसे छाती पीट-पीटकर रो रही हैं। उसी समय मेघनाद आया और उसने बहुत-सी कथाएँ कहकर पिताको समझाया॥ ३ ॥

चौ०

देखेहु कालि मोरि मनुसाई। अबहिं बहुत का करौं बड़ाई॥ इष्टदेव सैं बल रथ पायउँ। सो बल तात न तोहि देखायउँ॥४॥

भावार्थ

[ और कहा— ] कल मेरा पुरुषार्थ देखियेगा। अभी बहुत बड़ाई क्या करूँ? हे तात! मैंने अपने इष्टदेवसे जो बल और रथ पाया था वह बल [ और रथ ] अबतक आपको नहीं दिखलाया था॥ ४ ॥

चौ०

एहि बिधि जल्पत भयउ बिहाना। चहुँ दुआर लागे कपि नाना॥ इत कपि भालु काल सम बीरा। उत रजनीचर अति रनधीरा॥५॥

भावार्थ

इस प्रकार डींग मारते हुए सबेरा हो गया। लंकाके चारों दरवाजोंपर बहुत-से वानर आ डटे। इधर कालके समान वीर वानर-भालू हैं और उधर अत्यन्त रणधीर राक्षस॥ ५ ॥

चौ०

लरहिं सुभट निज निज जय हेतू। बरनि न जाइ समर खगकेतू॥६॥

भावार्थ

दोनों ओरके योद्धा अपनी-अपनी जयके लिये लड़ रहे हैं। हे गरुड़! उनके युद्धका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ६ ॥

दो०

मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गयउ अकास। गर्जेउ अट्टहास करि भइ कपि कटकहि त्रास॥७२॥

भावार्थ

मेघनाद उसी ( पूर्वोक्त ) मायामय रथपर चढ़कर आकाशमें चला गया और अट्टहास करके गरजा, जिससे वानरोंकी सेनामें भय छा गया॥ ७२ ॥

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