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दोहा 67

चौ०

कुंभकरन रन रंग बिरुद्धा। सन्मुख चला काल जनु क्रुद्धा॥ कोटि कोटि कपि धरि धरि खाई। जनु टीड़ी गिरि गुहाँ समाई॥१॥

भावार्थ

रणके उत्साहमें कुम्भकर्ण विरुद्ध होकर [ उनके ] सामने ऐसा चला मानो क्रोधित होकर काल ही आ रहा हो। वह करोड़-करोड़ वानरोंको एक साथ पकड़-पकड़कर खाने लगा। [ वे उसके मुँहमें इस तरह घुसने लगे ] मानो पर्वतकी गुफामें टिड्डियाँ समा रही हों॥ १ ॥

चौ०

कोटिन्ह गहि सरीर सन मर्दा। कोटिन्ह मीजि मिलव महि गर्दा॥ मुख नासा श्रवनन्हि कीं बाटा। निसरि पराहिं भालु कपि ठाटा॥२॥

भावार्थ

करोड़ों ( वानरों )-को पकड़कर उसने शरीरसे मसल डाला। करोड़ोंको हाथोंसे मलकर पृथ्वीकी धूलमें मिला दिया। [ पेटमें गये हुए ] भालू और वानरोंके ठट्ट-के-ठट्ट उसके मुख, नाक और कानोंकी राहसे निकल-निकलकर भाग रहे हैं॥ २॥

चौ०

रन मद मत्त निसाचर दर्पा। बिस्व ग्रसिहि जनु एहि बिधि अर्पा॥ मुरे सुभट सब फिरहिं न फेरे। सूझ न नयन सुनहिं नहिं टेरे॥३॥

भावार्थ

रणके मदमें मत्त राक्षस कुम्भकर्ण इस प्रकार गर्वित हुआ, मानो विधाताने उसको सारा विश्व अर्पण कर दिया हो, और उसे वह ग्रास कर जायगा। सब योद्धा भाग खड़े हुए, वे लौटाये भी नहीं लौटते। आँखोंसे उन्हें सूझ नहीं पड़ता और पुकारनेसे सुनते नहीं!॥ ३ ॥

चौ०

कुंभकरन कपि फौज बिडारी। सुनि धाई रजनीचर धारी॥ देखी राम बिकल कटकाई। रिपु अनीक नाना बिधि आई॥४॥

भावार्थ

कुम्भकर्णने वानर-सेनाको तितर-बितर कर दिया। यह सुनकर राक्षस-सेना भी दौड़ी। श्रीरामचन्द्रजीने देखा कि अपनी सेना व्याकुल है और शत्रुकी नाना प्रकारकी सेना आ गयी है॥ ४॥

दो०

सुनु सुग्रीव बिभीषन अनुज सँभारेहु सैन। मैं देखउँ खल बल दलहि बोले राजिवनैन॥६७॥

भावार्थ

तब कमलनयन श्रीरामजी बोले—हे सुग्रीव! हे विभीषण! और हे लक्ष्मण! सुनो, तुम सेनाको सँभालना। मैं इस दुष्टके बल और सेनाको देखता हूँ॥ ६७॥

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