दोहा 66
उमा करत रघुपति नरलीला। खेल गरुड़ जिमि अहिगन मीला॥ भृकुटि भंग जो कालहि खाई। ताहि कि सोहइ ऐसि लराई॥१॥
भावार्थ
( शिवजी कहते हैं— ) हे उमा! श्रीरघुनाथजी वैसे ही नरलीला कर रहे हैं जैसे गरुड़ सर्पोंके समूहमें मिलकर खेलता हो। जो भौंहके इशारेमात्रसे ( बिना परिश्रमके ) कालको भी खा जाता है, उसे कहीं ऐसी लड़ाई शोभा देती है?॥१॥
जग पावनि कीरति बिस्तरिहहिं। गाइ गाइ भवनिधि नर तरिहहिं॥ मुरुछा गइ मारुतसुत जागा। सुग्रीवहि तब खोजन लागा॥२॥
भावार्थ
भगवान् [ इसके द्वारा ] जगत्को पवित्र करनेवाली वह कीर्ति फैलायेंगे जिसे गा-गाकर मनुष्य भवसागरसे तर जायँगे। मूर्च्छा जाती रही, तब मारुति हनुमान्जी जागे और फिर वे सुग्रीवको खोजने लगे॥२॥
सुग्रीवहु कै मुरुछा बीती। निबुकि गयउ तेहि मृतक प्रतीती॥ काटेसि दसन नासिका काना। गरजि अकास चलेउ तेहिं जाना॥३॥
भावार्थ
सुग्रीवकी भी मूर्च्छा दूर हुई, तब वे [ मुर्दे-से होकर ] खिसक गये ( काँखसे नीचे गिर पड़े )। कुम्भकर्णने उनको मृतक जाना। उन्होंने कुम्भकर्णके नाक-कान दाँतोंसे काट लिये और फिर गरजकर आकाशकी ओर चले, तब कुम्भकर्णने जाना॥ ३ ॥
गहेउ चरन गहि भूमि पछारा। अति लाघवँ उठि पुनि तेहि मारा॥ पुनि आयउ प्रभु पहिं बलवाना। जयति जयति जय कृपानिधाना॥४॥
भावार्थ
उसने सुग्रीवका पैर पकड़कर उनको पृथ्वीपर पछाड़ दिया। फिर सुग्रीवने बड़ी फुर्तीसे उठकर उसको मारा। और तब बलवान् सुग्रीव प्रभुके पास आये और बोले—कृपानिधान प्रभुकी जय हो, जय हो, जय हो॥ ४॥
नाक कान काटे जियँ जानी। फिरा क्रोध करि भइ मन ग्लानी॥ सहज भीम पुनि बिनु श्रुति नासा। देखत कपि दल उपजी त्रासा॥५॥
भावार्थ
नाक-कान काटे गये, ऐसा मनमें जानकर बड़ी ग्लानि हुई; और वह क्रोध करके लौटा। एक तो वह स्वभाव ( आकृति )-से ही भयंकर था और फिर बिना नाक-कानका होनेसे और भी भयानक हो गया। उसे देखते ही वानरोंकी सेनामें भय उत्पन्न हो गया॥५॥
जय जय जय रघुबंस मनि धाए कपि दै हूह। एकहि बार तासु पर छाड़ेन्हि गिरि तरु जूह॥६६॥
भावार्थ
‘रघुवंशमणिकी जय हो, जय हो, जय हो’ ऐसा पुकारकर वानर हूह करके दौड़े और सबने एक ही साथ उसपर पहाड़ और वृक्षोंके समूह छोड़े॥ ६६ ॥
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