दोहा 51
लक्ष्मण-मेघनाद-युद्ध, लक्ष्मणजीको शक्ति लगना
देखि पवनसुत कटक बिहाला। क्रोधवंत जनु धायउ काला॥ महासैल एक तुरत उपारा। अति रिस मेघनाद पर डारा॥१॥
भावार्थ
सारी सेनाको बेहाल ( व्याकुल ) देखकर पवनपुत्र हनुमान् क्रोध करके ऐसे दौड़े मानो स्वयं काल दौड़ा आता हो। उन्होंने तुरंत एक बड़ा भारी पहाड़ उखाड़ लिया और बड़े ही क्रोधके साथ उसे मेघनादपर छोड़ा॥१॥
आवत देखि गयउ नभ सोई। रथ सारथी तुरग सब खोई॥ बार बार पचार हनुमाना। निकट न आव मरमु सो जाना॥२॥
भावार्थ
पहाड़को आते देखकर वह आकाशमें उड़ गया। [ उसके ] रथ, सारथि और घोड़े सब नष्ट हो गये ( चूर-चूर हो गये )। हनुमान्जी उसे बार-बार ललकारते हैं। पर वह निकट नहीं आता, क्योंकि वह उनके बलका मर्म जानता था॥२॥
रघुपति निकट गयउ घननादा। नाना भाँति करेसि दुर्बादा॥ अस्त्र सस्त्र आयुध सब डारे। कौतुकहीं प्रभु काटि निवारे॥३॥
भावार्थ
[ तब ] मेघनाद श्रीरघुनाथजीके पास गया और उसने [ उनके प्रति ] अनेकों प्रकारके दुर्वचनोंका प्रयोग किया। [ फिर ] उसने उनपर अस्त्र-शस्त्र तथा और सब हथियार चलाये। प्रभुने खेलमें ही सबको काटकर अलग कर दिया॥३॥
देखि प्रताप मूढ़ खिसिआना। करै लाग माया बिधि नाना॥ जिमि कोउ करै गरुड़ सैं खेला। डरपावै गहि स्वल्प सपेला॥४॥
भावार्थ
श्रीरामजीका प्रताप ( सामर्थ्य ) देखकर वह मूर्ख लज्जित हो गया और अनेकों प्रकारकी माया करने लगा। जैसे कोई व्यक्ति छोटा-सा साँपका बच्चा हाथमें लेकर गरुड़को डरावे और उससे खेल करे॥४॥
जासु प्रबल माया बस सिव बिरंचि बड़ छोट। ताहि दिखावइ निसिचर निज माया मति खोट॥५१॥
भावार्थ
शिवजी और ब्रह्माजीतक बड़े-छोटे [ सभी ] जिनकी अत्यन्त बलवान् मायाके वशमें हैं, नीचबुद्धि निशाचर उनको अपनी माया दिखलाता है॥५१॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें