दोहा 50
कहँ कोसलाधीस द्वौ भ्राता। धन्वी सकल लोक बिख्याता॥ कहँ नल नील दुबिद सुग्रीवा। अंगद हनूमंत बल सींवा॥ १ ॥
भावार्थ
[ मेघनादने पुकारकर कहा— ] समस्त लोकोंमें प्रसिद्ध धनुर्धर कोसलाधीश दोनों भाई कहाँ हैं ? नल, नील, द्विविद, सुग्रीव और बलकी सीमा अङ्गद और हनुमान् कहाँ हैं?॥ १॥
कहाँ बिभीषनु भ्राताद्रोही। आजु सबहि हठि मारउँ ओही॥ अस कहि कठिन बान संधाने। अतिसय क्रोध श्रवन लगि ताने॥२॥
भावार्थ
भाईसे द्रोह करनेवाला विभीषण कहाँ है ? आज मैं सबको और उस दुष्टको तो हठपूर्वक ( अवश्य ही ) मारूँगा। ऐसा कहकर उसने धनुषपर कठिन बाणोंका सन्धान किया और अत्यन्त क्रोध करके उसे कानतक खींचा॥ २॥
सर समूह सो छाड़ै लागा। जनु सपच्छ धावहिं बहु नागा॥ जहँ तहँ परत देखिअहिं बानर। सन्मुख होइ न सके तेहि अवसर॥३॥
भावार्थ
वह बाणोंके समूह छोड़ने लगा। मानो बहुत-से पंखवाले साँप दौड़े जा रहे हों। जहाँ-तहाँ वानर गिरते दिखायी पड़ने लगे। उस समय कोई भी उसके सामने न हो सके॥ ३॥
जहँ तहँ भागि चले कपि रीछा। बिसरी सबहि जुद्ध कै ईछा॥ सो कपि भालु न रन महँ देखा। कीन्हेसि जेहि न प्रान अवसेषा॥४॥
भावार्थ
रीछ-वानर जहाँ-तहाँ भाग चले। सबको युद्धकी इच्छा भूल गयी। रणभूमिमें ऐसा एक भी वानर या भालू नहीं दिखायी पड़ा जिसको उसने प्राणमात्र अवशेष न कर दिया हो ( अर्थात् जिसके केवल प्राणमात्र ही न बचे हों; बल, पुरुषार्थ सारा जाता न रहा हो )॥ ४॥
दस दस सर सब मारेसि परे भूमि कपि बीर। सिंहनाद करि गर्जा मेघनाद बल धीर॥५०॥
भावार्थ
फिर उसने सबको दस-दस बाण मारे, वानर वीर पृथ्वीपर गिर पड़े। बलवान् और धीर मेघनाद सिंहके समान नाद करके गरजने लगा॥ ५०॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें