दोहा 25
सुनु सठ सोइ रावन बलसीला। हरगिरि जान जासु भुज लीला॥ जान उमापति जासु सुराई। पूजेउँ जेहि सिर सुमन चढ़ाई॥१॥
भावार्थ
[ रावणने कहा— ] अरे मूर्ख! सुन, मैं वही बलवान् रावण हूँ जिसकी भुजाओंकी लीला ( करामात ) कैलास पर्वत जानता है। जिसकी शूरता उमापति महादेवजी जानते हैं, जिन्हें अपने सिररूपी पुष्प चढ़ा-चढ़ाकर मैंने पूजा था॥ १ ॥
सिर सरोज निज करन्हि उतारी। पूजेउँ अमित बार त्रिपुरारी॥ भुज बिक्रम जानहिं दिगपाला। सठ अजहूँ जिन्ह कें उर साला॥२॥
भावार्थ
सिररूपी कमलोंको अपने हाथोंसे उतार-उतारकर मैंने अगणित बार त्रिपुरारि शिवजीकी पूजा की है। अरे मूर्ख! मेरी भुजाओंका पराक्रम दिक्पाल जानते हैं, जिनके हृदयमें वह आज भी चुभ रहा है॥ २ ॥
जानहिं दिग्गज उर कठिनाई। जब जब भिरउँ जाइ बरिआई॥ जिन्ह के दसन कराल न फूटे। उर लागत मूलक इव टूटे॥३॥
भावार्थ
दिग्गज ( दिशाओंके हाथी ) मेरी छातीकी कठोरताको जानते हैं। जिनके भयानक दाँत, जब-जब जाकर मैं उनसे जबरदस्ती भिड़ा, मेरी छातीमें कभी नहीं फूटे ( अपना चिह्न भी नहीं बना सके ), बल्कि मेरी छातीसे लगते ही वे मूलीकी तरह टूट गये॥ ३ ॥
जासु चलत डोलति इमि धरनी। चढ़त मत्त गज जिमि लघु तरनी॥ सोइ रावन जग बिदित प्रतापी। सुनेहि न श्रवन अलीक प्रलापी॥४॥
भावार्थ
जिसके चलते समय पृथ्वी इस प्रकार हिलती है जैसे मतवाले हाथीके चढ़ते समय छोटी नाव! मैं वही जगत्प्रसिद्ध प्रतापी रावण हूँ। अरे झूठी बकवाद करनेवाले! क्या तूने मुझको कानोंसे कभी नहीं सुना?॥ ४ ॥
तेहि रावन कहँ लघु कहसि नर कर करसि बखान। रे कपि बर्बर खर्ब खल अब जाना तव ग्यान॥२५॥
भावार्थ
उस ( महान् प्रतापी और जगत्प्रसिद्ध ) रावणको ( मुझे ) तू छोटा कहता है और मनुष्यकी बड़ाई करता है? अरे दुष्ट, असभ्य, तुच्छ बंदर! अब मैंने तेरा ज्ञान जान लिया॥ २५ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें