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दोहा 24

चौ०

धन्य कीस जो निज प्रभु काजा। जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा॥ नाचि कूदि करि लोग रिझाई। पति हित करइ धर्म निपुनाई॥१॥

भावार्थ

बंदरको धन्य है, जो अपने मालिकके लिये लाज छोड़कर जहाँ-तहाँ नाचता है। नाच-कूदकर, लोगोंको रिझाकर, मालिकका हित करता है। यह उसके धर्मकी निपुणता है॥ १ ॥

चौ०

अंगद स्वामिभक्त तव जाती। प्रभु गुन कस न कहसि एहि भाँती॥ मैं गुन गाहक परम सुजाना। तव कटु रटनि करउँ नहिं काना॥२॥

भावार्थ

हे अंगद! तेरी जाति स्वामिभक्त है। [ फिर भला ] तू अपने मालिकके गुण इस प्रकार कैसे न बखानेगा? मैं गुणग्राहक ( गुणोंका आदर करनेवाला ) और परम सुजान ( समझदार ) हूँ, इसीसे तेरी जली-कटी बक-बकपर कान ( ध्यान ) नहीं देता॥ २ ॥

चौ०

कह कपि तव गुन गाहकताई। सत्य पवनसुत मोहि सुनाई॥ बन बिधंसि सुत बधि पुर जारा। तदपि न तेहिं कछु कृत अपकारा॥३॥

भावार्थ

अंगदने कहा—तुम्हारी सच्ची गुणग्राहकता तो मुझे हनुमान्‌ने सुनायी थी। उसने अशोकवनको विध्वंस ( तहस-नहस ) करके, तुम्हारे पुत्रको मारकर नगरको जला दिया था। तो भी [ तुमने अपनी गुणग्राहकताके कारण यही समझा कि ] उसने तुम्हारा कुछ भी अपकार नहीं किया॥ ३ ॥

चौ०

सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई। दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई॥ देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा। तुम्हरें लाज न रोष न माखा॥४॥

भावार्थ

तुम्हारा वही सुन्दर स्वभाव विचारकर, हे दशग्रीव! मैंने कुछ धृष्टता की है। हनुमान्‌ने जो कुछ कहा था, उसे आकर मैंने प्रत्यक्ष देख लिया कि तुम्हें न लज्जा है, न क्रोध है और न चिढ़ है॥ ४ ॥

चौ०

जौं असि मति पितु खाए कीसा। कहि अस बचन हँसा दससीसा॥ पितहि खाइ खातेउँ पुनि तोही। अबहीं समुझि परा कछु मोही॥५॥

भावार्थ

[ रावण बोला— ] अरे वानर! जब तेरी ऐसी बुद्धि है तभी तो तू बापको खा गया। ऐसा वचन कहकर रावण हँसा। अंगदने कहा—पिताको खाकर फिर तुमको भी खा डालता। परन्तु अभी तुरंत कुछ और ही बात मेरी समझमें आ गयी!॥ ५ ॥

चौ०

बालि बिमल जस भाजन जानी। हतउँ न तोहि अधम अभिमानी॥ कहु रावन रावन जग केते। मैं निज श्रवन सुने सुनु जेते॥६॥

भावार्थ

अरे नीच अभिमानी! बालिके निर्मल यशका पात्र ( कारण ) जानकर तुम्हें मैं नहीं मारता। रावण! यह तो बता कि जगत्‌में कितने रावण हैं? मैंने जितने रावण अपने कानोंसे सुन रखे हैं, उन्हें सुन— ॥ ६ ॥

चौ०

बलिहि जितन एक गयउ पताला। राखेउ बाँधि सिसुन्ह हयसाला॥ खेलहिं बालक मारहिं जाई। दया लागि बलि दीन्ह छोड़ाई॥७॥

भावार्थ

एक रावण तो बलिको जीतने पातालमें गया था, तब बच्चोंने उसे घुड़सालमें बाँध रखा। बालक खेलते थे और जा-जाकर उसे मारते थे। बलिको दया लगी, तब उन्होंने उसे छुड़ा दिया॥ ७ ॥

चौ०

एक बहोरि सहसभुज देखा। धाइ धरा जिमि जंतु बिसेषा॥ कौतुक लागि भवन लै आवा। सो पुलस्ति मुनि जाइ छोड़ावा॥८॥

भावार्थ

फिर एक रावणको सहस्रबाहुने देखा और उसने दौड़कर उसको एक विशेष प्रकारके ( विचित्र ) जन्तुकी तरह [ समझकर ] पकड़ लिया। तमाशेके लिये वह उसे घर ले आया। तब पुलस्त्य मुनिने जाकर उसे छुड़ाया॥ ८ ॥

दो०

एक कहत मोहि सकुच अति रहा बालि कीं काँख। इन्ह महुँ रावन तैं कवन सत्य बदहि तजि माख॥२४॥

भावार्थ

एक रावणकी बात कहनेमें तो मुझे बड़ा संकोच हो रहा है—वह [ बहुत दिनोंतक ] बालिकी काँखमें रहा था। इनमेंसे तुम कौन-से रावण हो? खीझना छोड़कर सच-सच बताओ॥ २४ ॥

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