दोहा 121b
श्रीरामचरितकी महिमा
प्रभु हनुमंतहि कहा बुझाई। धरि बटु रूप अवधपुर जाई॥ भरतहि कुसल हमारि सुनाएहु। समाचार लै तुम्ह चलि आएहु॥१॥
भावार्थ
तदनन्तर प्रभुने हनुमान्जीको समझाकर कहा—तुम ब्रह्मचारीका रूप धरकर अवधपुरीको जाओ। भरतको हमारी कुशल सुनाना और उनका समाचार लेकर चले आना॥१॥
तुरत पवनसुत गवनत भयऊ। तब प्रभु भरद्वाज पहिं गयऊ॥ नाना बिधि मुनि पूजा कीन्ही। अस्तुति करि पुनि आसिष दीन्ही॥२॥
भावार्थ
पवनपुत्र हनुमान्जी तुरंत ही चल दिये। तब प्रभु भरद्वाजजीके पास गये। मुनिने [इष्टबुद्धिसे] उनकी अनेकों प्रकारसे पूजा की और स्तुति की और फिर [लीलाकी दृष्टिसे] आशीर्वाद दिया॥२॥
मुनि पद बंदि जुगल कर जोरी। चढ़ि बिमान प्रभु चले बहोरी॥ इहाँ निषाद सुना प्रभु आए। नाव नाव कहँ लोग बोलाए॥३॥
भावार्थ
दोनों हाथ जोड़कर तथा मुनिके चरणोंकी वन्दना करके प्रभु विमानपर चढ़कर फिर (आगे) चले। यहाँ जब निषादराजने सुना कि प्रभु आ गये, तब उसने ‘नाव कहाँ है? नाव कहाँ है?’ पुकारते हुए लोगोंको बुलाया॥३॥
सुरसरि नाघि जान तब आयो। उतरेउ तट प्रभु आयसु पायो॥ तब सीताँ पूजी सुरसरी। बहु प्रकार पुनि चरनन्हि परी॥४॥
भावार्थ
इतनेमें ही विमान गङ्गाजीको लाँघकर [इस पार] आ गया और प्रभुकी आज्ञा पाकर वह किनारेपर उतरा। तब सीताजी बहुत प्रकारसे गङ्गाजीकी पूजा करके फिर उनके चरणोंपर गिरीं॥४॥
दीन्हि असीस हरषि मन गंगा। सुंदरि तव अहिवात अभंगा॥ सुनत गुहा धायउ प्रेमाकुल। आयउ निकट परम सुख संकुल॥५॥
भावार्थ
गङ्गाजीने मनमें हर्षित होकर आशीर्वाद दिया—हे सुन्दरी! तुम्हारा सुहाग अखण्ड हो। भगवान्के तटपर उतरनेकी बात सुनते ही निषादराज गुह प्रेममें विह्वल होकर दौड़ा। परम सुखसे परिपूर्ण होकर वह प्रभुके समीप आया,॥५॥
प्रभुहि सहित बिलोकि बैदेही। परेउ अवनि तन सुधि नहिं तेही॥ प्रीति परम बिलोकि रघुराई। हरषि उठाइ लियो उर लाई॥६॥
भावार्थ
और श्रीजानकीजीसहित प्रभुको देखकर वह [आनन्द-समाधिमें मग्न होकर] पृथ्वीपर गिर पड़ा, उसे शरीरकी सुधि न रही। श्रीरघुनाथजीने उसका परम प्रेम देखकर उसे उठाकर हर्षके साथ हृदयसे लगा लिया॥६॥
लियो हृदयँ लाइ कृपा निधान सुजान रायँ रमापती। बैठारि परम समीप बूझी कुसल सो कर बीनती॥ अब कुसल पद पंकज बिलोकि बिरंचि संकर सेब्य जे। सुख धाम पूरनकाम राम नमामि राम नमामि ते॥१॥
भावार्थ
सुजानोंके राजा (शिरोमणि), लक्ष्मीकान्त, कृपानिधान भगवान्ने उसको हृदयसे लगा लिया और अत्यन्त निकट बैठाकर कुशल पूछी। वह विनती करने लगा—आपके जो चरणकमल ब्रह्माजी और शङ्करजीसे सेवित हैं, उनके दर्शन करके मैं अब सकुशल हूँ। हे सुखधाम! हे पूर्णकाम श्रीरामजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ, नमस्कार करता हूँ॥१॥
सब भाँति अधम निषाद सो हरि भरत ज्यों उर लाइयो। मतिमंद तुलसीदास सो प्रभु मोह बस बिसराइयो॥ यह रावनारि चरित्र पावन राम पद रतिप्रद सदा। कामादिहर बिग्यानकर सुर सिद्ध मुनि गावहिं मुदा॥२॥
भावार्थ
सब प्रकारसे नीच उस निषादको भगवान्ने भरतजीकी भाँति हृदयसे लगा लिया। तुलसीदासजी कहते हैं—इस मन्दबुद्धिने (मैंने) मोहवश उस प्रभुको भुला दिया। रावणके शत्रुका यह पवित्र करनेवाला चरित्र सदा ही श्रीरामजीके चरणोंमें प्रीति उत्पन्न करनेवाला है। यह कामादि विकारोंका हरनेवाला और [भगवान्के स्वरूपका] विशेष ज्ञान उत्पन्न करनेवाला है। देवता, सिद्ध और मुनि आनन्दित होकर इसे गाते हैं॥२॥
समर बिजय रघुबीर के चरित जे सुनहिं सुजान। बिजय बिबेक बिभूति नित तिन्हहि देहिं भगवान॥१२१(क)॥
भावार्थ
जो सुजान लोग श्रीरघुवीरकी समरविजयसम्बन्धी लीलाको सुनते हैं, उनको भगवान् नित्य विजय, विवेक और विभूति (ऐश्वर्य) देते हैं॥१२१(क)॥
यह कलिकाल मलायतन मन करि देखु बिचार। श्रीरघुनाथ नाम तजि नाहिन आन अधार॥१२१(ख)॥
भावार्थ
अरे मन! विचार करके देख! यह कलिकाल पापोंका घर है। इसमें श्रीरघुनाथजीके नामको छोड़कर [पापोंसे बचनेके लिये] दूसरा कोई आधार नहीं है॥१२१(ख)॥
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