दोहा 120b
तुरत बिमान तहाँ चलि आवा। दंडक बन जहँ परम सुहावा॥ कुंभजादि मुनिनायक नाना। गए रामु सब कें अस्थाना॥१॥
भावार्थ
विमान शीघ्र ही वहाँ चला आया जहाँ परम सुन्दर दण्डकवन था, और अगस्त्य आदि बहुत-से मुनिराज रहते थे। श्रीरामजी इन सबके स्थानोंमें गये॥१॥
सकल रिषिन्ह सन पाइ असीसा। चित्रकूट आए जगदीसा॥ तहँ करि मुनिन्ह केर संतोषा। चला बिमानु तहाँ ते चोखा॥२॥
भावार्थ
सम्पूर्ण ऋषियोंसे आशीर्वाद पाकर जगदीश्वर श्रीरामजी चित्रकूट आये। वहाँ मुनियोंको सन्तुष्ट किया। [फिर] विमान वहाँसे आगे तेजीके साथ चला॥२॥
बहुरि राम जानकिहि देखाई। जमुना कलि मल हरनि सुहाई॥ पुनि देखी सुरसरी पुनीता। राम कहा प्रनाम करु सीता॥३॥
भावार्थ
फिर श्रीरामजीने जानकीजीको कलियुगके पापोंका हरण करनेवाली सुहावनी यमुनाजीके दर्शन कराये। फिर पवित्र गङ्गाजीके दर्शन किये। श्रीरामजीने कहा—हे सीते! इन्हें प्रणाम करो॥३॥
तीरथपति पुनि देखु प्रयागा। निरखत जन्म कोटि अघ भागा॥ देखु परम पावनि पुनि बेनी। हरनि सोक हरि लोक निसेनी॥४॥ पुनि देखु अवधपुरी अति पावनि। त्रिबिध ताप भव रोग नसावनि॥५॥
भावार्थ
फिर तीर्थराज प्रयागको देखो, जिसके दर्शनसे ही करोड़ों जन्मोंके पाप भाग जाते हैं। फिर परम पवित्र त्रिवेणीजीके दर्शन करो, जो शोकोंको हरनेवाली और श्रीहरिके परम धाम [पहुँचने] के लिये सीढ़ीके समान है। फिर अत्यन्त पवित्र अयोध्यापुरीके दर्शन करो, जो तीनों प्रकारके तापों और भव (आवागमनरूपी) रोगका नाश करनेवाली है॥४-५॥
सीता सहित अवध कहुँ कीन्ह कृपाल प्रनाम। सजल नयन तन पुलकित पुनि पुनि हरषित राम॥१२०(क)॥
भावार्थ
यों कहकर कृपालु श्रीरामजीने सीताजीसहित अवधपुरीको प्रणाम किया। सजलनेत्र और पुलकितशरीर होकर श्रीरामजी बार-बार हर्षित हो रहे हैं॥१२०(क)॥
पुनि प्रभु आइ त्रिबेनीं हरषित मज्जनु कीन्ह। कपिन्ह सहित बिप्रन्ह कहुँ दान बिबिध बिधि दीन्ह॥१२०(ख)॥
भावार्थ
फिर त्रिवेणीमें आकर प्रभुने हर्षित होकर स्नान किया और वानरोंसहित ब्राह्मणोंको अनेकों प्रकारके दान दिये॥१२०(ख)॥
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