Ramayana.com

दोहा 107

चौ०

पुनि प्रभु बोलि लियउ हनुमाना। लंका जाहु कहेउ भगवाना॥ समाचार जानकिहि सुनावहु। तासु कुसल लै तुम्ह चलि आवहु॥१॥

भावार्थ

फिर प्रभुने हनुमान्‌जीको बुला लिया। भगवान्‌ने कहा—तुम लङ्का जाओ। जानकीको सब समाचार सुनाओ और उसका कुशल-समाचार लेकर तुम चले आओ॥१॥

चौ०

तब हनुमंत नगर महुँ आए। सुनि निसिचरी निसाचर धाए॥ बहु प्रकार तिन्ह पूजा कीन्ही। जनकसुता देखाइ पुनि दीन्ही॥२॥

भावार्थ

तब हनुमान्‌जी नगरमें आये। यह सुनकर राक्षस-राक्षसी [ उनके सत्कारके लिये ] दौड़े। उन्होंने बहुत प्रकारसे हनुमान्‌जीकी पूजा की और फिर श्रीजानकीजीको दिखला दिया॥२॥

चौ०

दूरिहि ते प्रनाम कपि कीन्हा। रघुपति दूत जानकी चीन्हा॥ कहहु तात प्रभु कृपानिकेता। कुसल अनुज कपि सेन समेता॥३॥

भावार्थ

हनुमान्‌जीने [ सीताजीको ] दूरसे ही प्रणाम किया। जानकीजीने पहचान लिया कि यह वही श्रीरघुनाथजीका दूत है [ और पूछा— ] हे तात! कहो, कृपाके धाम मेरे प्रभु छोटे भाई और वानरोंकी सेनासहित कुशलसे तो हैं?॥३॥

चौ०

सब बिधि कुसल कोसलाधीसा। मातु समर जीत्यो दससीसा॥ अबिचल राजु बिभीषन पायो। सुनि कपि बचन हरष उर छायो॥४॥

भावार्थ

[ हनुमान्‌जीने कहा— ] हे माता! कोसलपति श्रीरामजी सब प्रकारसे सकुशल हैं। उन्होंने संग्राममें दस सिरवाले रावणको जीत लिया है और विभीषणने अचल राज्य प्राप्त किया है। हनुमान्‌जीके वचन सुनकर सीताजीके हृदयमें हर्ष छा गया॥४॥

छं०

अति हरष मन तन पुलक लोचन सजल कह पुनि पुनि रमा। का देउँ तोहि त्रैलोक महुँ कपि किमपि नहिं बानी समा॥ सुनु मातु मैं पायो अखिल जग राजु आजु न संसयं। रन जीति रिपुदल बंधु जुत पस्यामि राममनामयं॥

भावार्थ

श्रीजानकीजीके हृदयमें अत्यन्त हर्ष हुआ। उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें [ आनन्दाश्रुओंका ] जल छा गया। वे बार-बार कहती हैं—हे हनुमान्! मैं तुझे क्या दूँ? इस वाणी ( समाचार ) के समान तीनों लोकोंमें और कुछ भी नहीं है! [ हनुमान्‌जीने कहा— ] हे माता! सुनिये, मैंने आज निःसन्देह सारे जगत्‌का राज्य पा लिया, जो मैं रणमें शत्रुसेनाको जीतकर भाईसहित निर्विकार श्रीरामजीको देख रहा हूँ।

दो०

सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदयँ बसहुँ हनुमंत। सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत अनंत॥१०७॥

भावार्थ

[जानकीजीने कहा— ] हे पुत्र! सुन, समस्त सद्‌गुण तेरे हृदयमें बसें और हे हनुमान्! शेष ( लक्ष्मणजी ) सहित कोसलपति प्रभु सदा तुझपर प्रसन्न रहें॥ १०७॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें