दोहा 24
कतहुँ होइ निसिचर सैं भेंटा। प्रान लेहिं एक एक चपेटा॥ बहु प्रकार गिरि कानन हेरहिं। कोउ मुनि मिलइ ताहि सब घेरहिं॥१॥
भावार्थ
कहीं किसी राक्षससे भेंट हो जाती है, तो एक-एक चपतमें ही उसके प्राण ले लेते हैं। पर्वतों और वनोंको बहुत प्रकारसे खोज रहे हैं। कोई मुनि मिल जाता है तो पता पूछनेके लिये उसे सब घेर लेते हैं॥१॥
लागि तृषा अतिसय अकुलाने। मिलइ न जल घन गहन भुलाने॥ मन हनुमान कीन्ह अनुमाना। मरन चहत सब बिनु जल पाना॥२॥
भावार्थ
इतनेमें ही सबको अत्यन्त प्यास लगी, जिससे सब अत्यन्त ही व्याकुल हो गये। किन्तु जल कहीं नहीं मिला। घने जंगलमें सब भुला गये। हनुमान्जीने मनमें अनुमान किया कि जल पिये बिना सब लोग मरना ही चाहते हैं॥२॥
चढ़ि गिरि सिखर चहूँ दिसि देखा। भूमि बिबर एक कौतुक पेखा॥ चक्रबाक बक हंस उड़ाहीं। बहुतक खग प्रबिसहिं तेहि माहीं॥३॥
भावार्थ
उन्होंने पहाड़की चोटीपर चढ़कर चारों ओर देखा तो पृथ्वीके अंदर एक गुफामें उन्हें एक कौतुक ( आश्चर्य ) दिखायी दिया। उसके ऊपर चकवे, बगुले और हंस उड़ रहे हैं और बहुत-से पक्षी उसमें प्रवेश कर रहे हैं॥३॥
गिरि ते उतरि पवनसुत आवा। सब कहुँ लै सोइ बिबर देखावा॥ आगें कै हनुमंतहि लीन्हा। पैठे बिबर बिलंबु न कीन्हा॥४॥
भावार्थ
पवनकुमार हनुमान्जी पर्वतसे उतर आये और सबको ले जाकर उन्होंने वह गुफा दिखलायी। सबने हनुमान्जीको आगे कर लिया और वे गुफामें घुस गये, देर नहीं की॥४॥
दीख जाइ उपबन बर सर बिगसित बहु कंज। मंदिर एक रुचिर तहँ बैठि नारि तप पुंज॥२४॥
भावार्थ
अंदर जाकर उन्होंने एक उत्तम उपवन ( बगीचा ) और तालाब देखा, जिसमें बहुत-से कमल खिले हुए हैं। वहीं एक सुन्दर मन्दिर है, जिसमें एक तपोमूर्ति स्त्री बैठी है॥२४॥
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