दोहा 23
सुनहु नील अंगद हनुमाना। जामवंत मतिधीर सुजाना॥ सकल सुभट मिलि दच्छिन जाहू। सीता सुधि पूँछेहु सब काहू॥१॥
भावार्थ
हे धीरबुद्धि और चतुर नील, अंगद, जाम्बवान् और हनुमान्! तुम सब श्रेष्ठ योद्धा मिलकर दक्षिण दिशाको जाओ और सब किसीसे सीताजीका पता पूछना॥ १ ॥
मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु। रामचंद्र कर काजु सँवारेहु॥ भानु पीठि सेइअ उर आगी। स्वामिहि सर्ब भाव छल त्यागी॥२॥
भावार्थ
मन, वचन तथा कर्मसे उसीका ( सीताजीका पता लगानेका ) उपाय सोचना। श्रीरामचन्द्रजीका कार्य सम्पन्न ( सफल ) करना। सूर्यको पीठसे और अग्निको हृदयसे ( सामनेसे ) सेवन करना चाहिये। परन्तु स्वामीकी सेवा तो छल छोड़कर सर्वभावसे ( मन, वचन, कर्मसे ) करनी चाहिये॥२॥
तजि माया सेइअ परलोका। मिटहिं सकल भवसंभव सोका॥ देह धरे कर यह फलु भाई। भजिअ राम सब काम बिहाई॥३॥
भावार्थ
माया ( विषयोंकी ममता-आसक्ति ) को छोड़कर परलोकका सेवन ( भगवान्के दिव्य धामकी प्राप्तिके लिये भगवत्सेवारूप साधन ) करना चाहिये, जिससे भव ( जन्म-मरण ) से उत्पन्न सारे शोक मिट जायँ। हे भाई! देह धारण करनेका यही फल है कि सब कामों ( कामनाओं ) को छोड़कर श्रीरामजीका भजन ही किया जाय॥३॥
सोइ गुनग्य सोई बड़भागी। जो रघुबीर चरन अनुरागी॥ आयसु मागि चरन सिरु नाई। चले हरषि सुमिरत रघुराई॥४॥
भावार्थ
सद्गुणोंको पहचाननेवाला ( गुणवान् ) तथा बड़भागी वही है जो श्रीरघुनाथजीके चरणोंका प्रेमी है। आज्ञा माँगकर और चरणोंमें सिर नवाकर श्रीरघुनाथजीका स्मरण करते हुए सब हर्षित होकर चले॥४॥
पाछें पवन तनय सिरु नावा। जानि काज प्रभु निकट बोलावा॥ परसा सीस सरोरुह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी॥५॥
भावार्थ
सबके पीछे पवनसुत श्रीहनुमान्जीने सिर नवाया। कार्यका विचार करके प्रभुने उन्हें अपने पास बुलाया। उन्होंने अपने कर-कमलसे उनके सिरका स्पर्श किया तथा अपना सेवक जानकर उन्हें अपने हाथकी अँगूठी उतारकर दी॥५॥
बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु। कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु॥ हनुमत जन्म सुफल करि माना। चलेउ हृदयँ धरि कृपानिधाना॥६॥
भावार्थ
[ और कहा— ] बहुत प्रकारसे सीताको समझाना और मेरा बल तथा विरह ( प्रेम ) कहकर तुम शीघ्र लौट आना। हनुमान्जीने अपना जन्म सफल समझा और कृपानिधान प्रभुको हृदयमें धारण करके वे चले॥६॥
जद्यपि प्रभु जानत सब बाता। राजनीति राखत सुरत्राता॥७॥
भावार्थ
यद्यपि देवताओंकी रक्षा करनेवाले प्रभु सब बात जानते हैं, तो भी वे राजनीतिकी रक्षा कर रहे हैं। ( नीतिकी मर्यादा रखनेके लिये सीताजीका पता लगानेको जहाँ-तहाँ वानरोंको भेज रहे हैं )॥७॥
चले सकल बन खोजत सरिता सर गिरि खोह। राम काज लयलीन मन बिसरा तन कर छोह॥२३॥
भावार्थ
सब वानर वन, नदी, तालाब, पर्वत और पर्वतोंकी कन्दराओंमें खोजते हुए चले जा रहे हैं। मन श्रीरामजीके कार्यमें लवलीन है। शरीरतकका प्रेम ( ममत्व ) भूल गया है॥२३॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें