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दोहा 75

चौ०

अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी। भए अनेक धीर मुनि ग्यानी॥ अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी। सत्य सदा संतत सुचि जानी॥१॥

भावार्थ

हे भवानी! धीर, मुनि और ज्ञानी बहुत हुए हैं, पर ऐसा ( कठोर ) तप किसीने नहीं किया। अब तू इस श्रेष्ठ ब्रह्माकी वाणीको सदा सत्य और निरन्तर पवित्र जानकर अपने हृदयमें धारण कर॥१॥

चौ०

आवै पिता बोलावन जबहीं। हठ परिहरि घर जाएहु तबहीं॥ मिलहिं तुम्हहि जब सप्त रिषीसा। जानेहु तब प्रमान बागीसा॥२॥

भावार्थ

जब तेरे पिता बुलानेको आवें, तब हठ छोड़कर घर चली जाना और जब तुम्हें सप्तर्षि मिलें तब इस वाणीको ठीक समझना॥२॥

चौ०

सुनत गिरा बिधि गगन बखानी। पुलक गात गिरिजा हरषानी॥ उमा चरित सुंदर मैं गावा। सुनहु संभु कर चरित सुहावा॥३॥

भावार्थ

[ इस प्रकार ] आकाशसे कही हुई ब्रह्माकी वाणीको सुनते ही पार्वतीजी प्रसन्न हो गयीं और [ हर्षके मारे ] उनका शरीर पुलकित हो गया। [ याज्ञवल्क्यजी भरद्वाजजीसे बोले कि ] मैंने पार्वतीका सुन्दर चरित्र सुनाया, अब शिवजीका सुहावना चरित्र सुनो॥३॥

चौ०

जब तें सतीं जाइ तनु त्यागा। तब तें सिव मन भयउ बिरागा॥ जपहिं सदा रघुनायक नामा। जहँ तहँ सुनहिं राम गुन ग्रामा॥ ४॥

भावार्थ

जबसे सतीने जाकर शरीरत्याग किया, तबसे शिवजीके मनमें वैराग्य हो गया। वे सदा श्रीरघुनाथजीका नाम जपने लगे और जहाँ-तहाँ श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंकी कथाएँ सुनने लगे॥४॥

दो०

चिदानंद सुखधाम सिव बिगत मोह मद काम। बिचरहिं महि धरि हृदयँ हरि सकल लोक अभिराम॥७५॥

भावार्थ

चिदानन्द, सुखके धाम, मोह, मद और कामसे रहित शिवजी सम्पूर्ण लोकोंको आनन्द देनेवाले भगवान्‌ श्रीहरि ( श्रीरामचन्द्रजी ) को हृदयमें धारण कर ( भगवान्‌के ध्यानमें मस्त हुए ) पृथ्वीपर विचरने लगे॥७५॥

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