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दोहा 74

चौ०

उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना॥ अति सुकुमार न तनु तप जोगू। पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू॥१॥

भावार्थ

प्राणपति ( शिवजी ) के चरणोंको हृदयमें धारण करके पार्वतीजी वनमें जाकर तप करने लगीं। पार्वतीजीका अत्यन्त सुकुमार शरीर तपके योग्य नहीं था, तो भी पतिके चरणोंका स्मरण करके उन्होंने सब भोगोंको तज दिया॥१॥

चौ०

नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा॥ संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गवाँए॥२॥

भावार्थ

स्वामीके चरणोंमें नित्य नया अनुराग उत्पन्न होने लगा और तपमें ऐसा मन लगा कि शरीरकी सारी सुध बिसर गयी। एक हजार वर्षतक उन्होंने मूल और फल खाये, फिर सौ वर्ष साग खाकर बिताये॥२॥

चौ०

कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किए कठिन कछु दिन उपबासा॥ बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोइ खाई॥३॥

भावार्थ

कुछ दिन जल और वायुका भोजन किया और फिर कुछ दिन कठोर उपवास किये। जो बेलपत्र सूखकर पृथ्वीपर गिरते थे, तीन हजार वर्षतक उन्हींको खाया॥३॥

चौ०

पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नामु तब भयउ अपरना॥ देखि उमहि तप खीन सरीरा। ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा॥४॥

भावार्थ

फिर सूखे पर्ण ( पत्ते ) भी छोड़ दिये, तभी पार्वतीका नाम ‘अपर्णा’ हुआ। तपसे उमाका शरीर क्षीण देखकर आकाशसे गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई— ॥४॥

दो०

भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिराजकुमारि। परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि॥७४॥

भावार्थ

हे पर्वतराजकी कुमारी! सुन, तेरा मनोरथ सफल हुआ। तू अब सारे असह्य क्लेशोंको ( कठिन तपको ) त्याग दे। अब तुझे शिवजी मिलेंगे॥७४॥

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