दोहा 300
कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं। कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं॥ चले मत्त गज घंट बिराजी। मनहुँ सुभग सावन घन राजी॥१॥
भावार्थ
श्रेष्ठ हाथियोंपर सुन्दर अंबारियाँ पड़ी हैं। वे जिस प्रकार सजायी गयी थीं, सो कहा नहीं जा सकता। मतवाले हाथी घंटोंसे सुशोभित होकर ( घंटे बजाते हुए ) चले, मानो सावनके सुन्दर बादलोंके समूह [ गरजते हुए ] जा रहे हों॥१॥
बाहन अपर अनेक बिधाना। सिबिका सुभग सुखासन जाना॥ तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर बृंदा। जनु तनु धरें सकल श्रुति छंदा॥२॥
भावार्थ
सुन्दर पालकियाँ, सुखसे बैठने योग्य तामजान ( जो कुर्सीनुमा होते हैं ) और रथ आदि और भी अनेकों प्रकारकी सवारियाँ हैं। उनपर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके समूह चढ़कर चले, मानो सब वेदोंके छन्द ही शरीर धारण किये हुए हों॥२॥
मागध सूत बंदि गुनगायक। चले जान चढ़ि जो जेहि लायक॥ बेसर ऊँट बृषभ बहु जाती। चले बस्तु भरि अगनित भाँती॥३॥
भावार्थ
मागध, सूत, भाट और गुण गानेवाले सब, जो जिस योग्य थे, वैसी सवारीपर चढ़कर चले। बहुत जातियोंके खच्चर, ऊँट और बैल असंख्यों प्रकारकी वस्तुएँ लाद-लादकर चले॥३॥
कोटिन्ह काँवरि चले कहारा। बिबिध बस्तु को बरनै पारा॥ चले सकल सेवक समुदाई। निज निज साजु समाजु बनाई॥४॥
भावार्थ
कहार करोड़ों काँवरें लेकर चले। उनमें अनेकों प्रकारकी इतनी वस्तुएँ थीं कि जिनका वर्णन कौन कर सकता है। सब सेवकोंके समूह अपना-अपना साज-समाज बनाकर चले॥४॥
सब कें उर निर्भर हरषु पूरित पुलक सरीर। कबहिं देखिबे नयन भरि रामु लखनु दोउ बीर॥३००॥
भावार्थ
सबके हृदयमें अपार हर्ष है और शरीर पुलकसे भरे हैं। [ सबको एक ही लालसा लगी है कि ] हम श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाइयोंको नेत्र भरकर कब देखेंगे॥३००॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें