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दोहा 299

चौ०

बाँधें बिरद बीर रन गाढ़े। निकसि भए पुर बाहेर ठाढ़े॥ फेरहिं चतुर तुरग गति नाना। हरषहिं सुनि सुनि पनव निसाना॥१॥

भावार्थ

शूरताका बाना धारण किये हुए रणधीर वीर सब निकलकर नगरके बाहर आ खड़े हुए। वे चतुर अपने घोड़ोंको तरह-तरहकी चालोंसे फेर रहे हैं और भेरी तथा नगाड़ेकी आवाज सुन-सुनकर प्रसन्न हो रहे हैं॥१॥

चौ०

रथ सारथिन्ह बिचित्र बनाए। ध्वज पताक मनि भूषन लाए॥ चवँर चारु किंकिनि धुनि करहीं। भानु जान सोभा अपहरहीं॥२॥

भावार्थ

सारथियोंने ध्वजा, पताका, मणि और आभूषणोंको लगाकर रथोंको बहुत विलक्षण बना दिया है। उनमें सुन्दर चँवर लगे हैं और घंटियाँ सुन्दर शब्द कर रही हैं। वे रथ इतने सुन्दर हैं मानो सूर्यके रथकी शोभाको छीने लेते हैं॥२॥

चौ०

सावँकरन अगनित हय होते। ते तिन्ह रथन्ह सारथिन्ह जोते॥ सुंदर सकल अलंकृत सोहे। जिन्हहि बिलोकत मुनि मन मोहे॥३॥

भावार्थ

अगणित श्यामकर्ण घोड़े थे। उनको सारथियोंने उन रथोंमें जोत दिया है, जो सभी देखनेमें सुन्दर और गहनोंसे सजाये हुए सुशोभित हैं, और जिन्हें देखकर मुनियोंके मन भी मोहित हो जाते हैं॥३॥

चौ०

जे जल चलहिं थलहि की नाईं। टाप न बूड़ बेग अधिकाईं॥ अस्त्र सस्त्र सबु साजु बनाई। रथी सारथिन्ह लिए बोलाई॥४॥

भावार्थ

जो जलपर भी जमीनकी तरह ही चलते हैं। वेगकी अधिकतासे उनकी टाप पानीमें नहीं डूबती। अस्त्र-शस्त्र और सब साज सजाकर सारथियोंने रथियोंको बुला लिया॥४॥

दो०

चढ़ि चढ़ि रथ बाहेर नगर लागी जुरन बरात। होत सगुन सुंदर सबहि जो जेहि कारज जात॥२९९॥

भावार्थ

रथोंपर चढ़-चढ़कर बारात नगरके बाहर जुटने लगी। जो जिस कामके लिये जाता है, सभीको सुन्दर शकुन होते हैं॥२९९॥

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