दोहा 301
गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा। रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा॥ निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना। निज पराइ कछु सुनिअ न काना॥ १॥
भावार्थ
हाथी गरज रहे हैं, उनके घंटोंकी भीषण ध्वनि हो रही है। चारों ओर रथोंकी घरघराहट और घोड़ोंकी हिनहिनाहट हो रही है। बादलोंका निरादर करते हुए नगाड़े घोर शब्द कर रहे हैं। किसीको अपनी-परायी कोई बात कानोंसे सुनायी नहीं देती॥ १ ॥
महा भीर भूपति के द्वारें। रज होइ जाइ पषान पबारें॥ चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नारीं। लिएँ आरती मंगल थारीं॥२॥
भावार्थ
राजा दशरथके दरवाजेपर इतनी भारी भीड़ हो रही है कि वहाँ पत्थर फेंका जाय तो वह भी पिसकर धूल हो जाय। अटारियोंपर चढ़ी स्त्रियाँ मङ्गल-थालोंमें आरती लिये देख रही हैं॥ २ ॥
गावहिं गीत मनोहर नाना। अति आनंदु न जाइ बखाना॥ तब सुमंत्र दुइ स्यंदन साजी। जोते रबि हय निंदक बाजी॥३॥
भावार्थ
और नाना प्रकारके मनोहर गीत गा रही हैं। उनके अत्यन्त आनन्दका बखान नहीं हो सकता। तब सुमन्त्रजीने दो रथ सजाकर उनमें सूर्यके घोड़ोंको भी मात करनेवाले घोड़े जोते॥ ३ ॥
दोउ रथ रुचिर भूप पहिं आने। नहिं सारद पहिं जाहिं बखाने॥ राज समाजु एक रथ साजा। दूसर तेज पुंज अति भ्राजा॥४॥
भावार्थ
दोनों सुन्दर रथ वे राजा दशरथके पास ले आये, जिनकी सुन्दरताका वर्णन सरस्वतीसे भी नहीं हो सकता। एक रथपर राजसी सामान सजाया गया। और दूसरा जो तेजका पुंज और अत्यन्त ही शोभायमान था,॥ ४ ॥
तेहिं रथ रुचिर बसिष्ठ कहुँ हरषि चढ़ाइ नरेसु। आपु चढ़ेउ स्यंदन सुमिरि हर गुर गौरि गनेसु॥३०१॥
भावार्थ
उस सुन्दर रथपर राजा वसिष्ठजीको हर्षपूर्वक चढ़ाकर फिर स्वयं शिव, गुरु, गौरी ( पार्वती ) और गणेशजीका स्मरण करके [ दूसरे ] रथपर चढ़े॥ ३०१ ॥
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