दोहा 214
श्रीराम-लक्ष्मणको देखकर जनकजीकी प्रेम-मुग्धता
सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा। भूप भीर नट मागध भाटा॥ बनी बिसाल बाजि गज साला। हय गय रथ संकुल सब काला॥१॥
भावार्थ
राजमहलके सब दरवाजे ( फाटक ) सुन्दर हैं, जिनमें वज्रके ( मजबूत अथवा हीरोंके चमकते हुए ) किवाड़ लगे हैं। वहाँ [ मातहत ] राजाओं, नटों, मागधों और भाटोंकी भीड़ लगी रहती है। घोड़ों और हाथियोंके लिये बहुत बड़ी-बड़ी घुड़शालें और गजशालाएँ ( फीलखाने ) बनी हुई हैं; जो सब समय घोड़े, हाथी और रथोंसे भरी रहती हैं॥१॥
सूर सचिव सेनप बहुतेरे। नृपगृह सरिस सदन सब केरे॥ पुर बाहेर सर सरित समीपा। उतरे जहँ तहँ बिपुल महीपा॥२॥
भावार्थ
बहुत-से शूरवीर, मन्त्री और सेनापति हैं। उन सबके घर भी राजमहल-सरीखे ही हैं। नगरके बाहर तालाब और नदीके निकट जहाँ-तहाँ बहुत-से राजालोग उतरे हुए ( डेरा डाले हुए ) हैं॥२॥
देखि अनूप एक अँवराई। सब सुपास सब भाँति सुहाई॥ कौसिक कहेउ मोर मनु माना। इहाँ रहिअ रघुबीर सुजाना॥३॥
भावार्थ
[ वहीं ] आमोंका एक अनुपम बाग देखकर, जहाँ सब प्रकारके सुभीते थे और जो सब तरहसे सुहावना था, विश्वामित्रजीने कहा—हे सुजान रघुवीर! मेरा मन कहता है कि यहीं रहा जाय॥३॥
भलेहिं नाथ कहि कृपानिकेता। उतरे तहँ मुनिबृंद समेता॥ बिस्वामित्र महामुनि आए। समाचार मिथिलापति पाए॥४॥
भावार्थ
कृपाके धाम श्रीरामचन्द्रजी ‘बहुत अच्छा स्वामिन्!’ कहकर वहीं मुनियोंके समूहके साथ ठहर गये। मिथिलापति जनकजीने जब यह समाचार पाया कि महामुनि विश्वामित्र आये हैं,॥४॥
संग सचिव सुचि भूरि भट भूसुर बर गुर ग्याति। चले मिलन मुनिनायकहि मुदित राउ एहि भाँति॥२१४॥
भावार्थ
तब उन्होंने पवित्र हृदयके ( ईमानदार, स्वामिभक्त ) मन्त्री, बहुत-से योद्धा, श्रेष्ठ ब्राह्मण, गुरु ( शतानन्दजी ) और अपनी जातिके श्रेष्ठ लोगोंको साथ लिया और इस प्रकार प्रसन्नताके साथ राजा मुनियोंके स्वामी विश्वामित्रजीसे मिलने चले॥२१४॥
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