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दोहा 213

चौ०

बनइ न बरनत नगर निकाई। जहाँ जाइ मन तहँइँ लोभाई॥ चारु बजारु बिचित्र अँबारी। मनिमय बिधि जनु स्वकर सँवारी॥१॥

भावार्थ

नगरकी सुन्दरताका वर्णन करते नहीं बनता। मन जहाँ जाता है; वहीं लुभा जाता ( रम जाता ) है। सुन्दर बाजार है, मणियोंसे बने हुए विचित्र छज्जे हैं, मानो ब्रह्माने उन्हें अपने हाथोंसे बनाया है॥१॥

चौ०

धनिक बनिक बर धनद समाना। बैठे सकल बस्तु लै नाना॥ चौहट सुंदर गलीं सुहाई। संतत रहहिं सुगंध सिंचाई॥२॥

भावार्थ

कुबेरके समान श्रेष्ठ धनी व्यापारी सब प्रकारकी अनेक वस्तुएँ लेकर [ दूकानोंमें ] बैठे हैं। सुन्दर चौराहे और सुहावनी गलियाँ सदा सुगन्धसे सिंची रहती हैं॥२॥

चौ०

मंगलमय मंदिर सब केरें। चित्रित जनु रतिनाथ चितेरें॥ पुर नर नारि सुभग सुचि संता। धरमसील ग्यानी गुनवंता॥३॥

भावार्थ

सबके घर मङ्गलमय हैं और उनपर चित्र कढ़े हुए हैं, जिन्हें मानो कामदेवरूपी चित्रकारने अंकित किया है। नगरके [ सभी ] स्त्री-पुरुष सुन्दर, पवित्र, साधु-स्वभाववाले, धर्मात्मा, ज्ञानी और गुणवान् हैं॥३॥

चौ०

अति अनूप जहँ जनक निवासू। बिथकहिं बिबुध बिलोकि बिलासू॥ होत चकित चित कोट बिलोकी। सकल भुवन सोभा जनु रोकी॥४॥

भावार्थ

जहाँ जनकजीका अत्यन्त अनुपम ( सुन्दर ) निवासस्थान ( महल ) है, वहाँके विलास ( ऐश्वर्य ) को देखकर देवता भी थकित ( स्तम्भित ) हो जाते हैं [ मनुष्योंकी तो बात ही क्या! ]। कोट ( राजमहलके परकोटे ) को देखकर चित्त चकित हो जाता है, [ ऐसा मालूम होता है ] मानो उसने समस्त लोकोंकी शोभाको रोक ( घेर ) रखा है॥४॥

दो०

धवल धाम मनि पुरट पट सुघटित नाना भाँति। सिय निवास सुंदर सदन सोभा किमि कहि जाति॥२१३॥

भावार्थ

उज्ज्वल महलोंमें अनेक प्रकारके सुन्दर रीतिसे बने हुए मणिजटित सोनेकी जरीके परदे लगे हैं। सीताजीके रहनेके सुन्दर महलकी शोभाका वर्णन किया ही कैसे जा सकता है॥२१३॥

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