दोहा 215
कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा। दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा॥ बिप्रबृंद सब सादर बंदे। जानि भाग्य बड़ राउ अनंदे॥१॥
भावार्थ
राजाने मुनिके चरणोंपर मस्तक रखकर प्रणाम किया। मुनियोंके स्वामी विश्वामित्रजीने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया। फिर सारी ब्राह्मणमण्डलीको आदरसहित प्रणाम किया और अपना बड़ा भाग्य जानकर राजा आनन्दित हुए॥१॥
कुसल प्रस्न कहि बारहिं बारा। बिस्वामित्र नृपहि बैठारा॥ तेहि अवसर आए दोउ भाई। गए रहे देखन फुलवाई॥२॥
भावार्थ
बार-बार कुशलप्रश्न करके विश्वामित्रजीने राजाको बैठाया। उसी समय दोनों भाई आ पहुँचे, जो फुलवाड़ी देखने गये थे॥२॥
स्याम गौर मृदु बयस किसोरा। लोचन सुखद बिस्व चित चोरा॥ उठे सकल जब रघुपति आए। बिस्वामित्र निकट बैठाए॥३॥
भावार्थ
सुकुमार किशोर अवस्थावाले, श्याम और गौर वर्णके दोनों कुमार नेत्रोंको सुख देनेवाले और सारे विश्वके चित्तको चुरानेवाले हैं। जब रघुनाथजी आये तब सभी [ उनके रूप एवं तेजसे प्रभावित होकर ] उठकर खड़े हो गये। विश्वामित्रजीने उनको अपने पास बैठा लिया॥३॥
भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता। बारि बिलोचन पुलकित गाता॥ मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी॥४॥
भावार्थ
दोनों भाइयोंको देखकर सभी सुखी हुए। सबके नेत्रोंमें जल भर आया ( आनन्द और प्रेमके आँसू उमड़ पड़े ) और शरीर रोमाञ्चित हो उठे। रामजीकी मधुर मनोहर मूर्तिको देखकर विदेह ( जनक ) विशेषरूपसे विदेह ( देहकी सुध-बुधसे रहित ) हो गये॥४॥
प्रेम मगन मनु जानि नृपु करि बिबेकु धरि धीर। बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गभीर॥२१५॥
भावार्थ
मनको प्रेममें मग्न जान राजा जनकने विवेकका आश्रय लेकर धीरज धारण किया और मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर गद्गद ( प्रेमभरी ) गम्भीर वाणीसे कहा— ॥२१५॥
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