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दोहा 180

चौ०

सुख संपति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई॥ नित नूतन सब बाढ़त जाई। जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई॥१॥

भावार्थ

सुख, सम्पत्ति, पुत्र, सेना, सहायक, जय, प्रताप, बल, बुद्धि और बड़ाई—ये सब उसके नित्य नये [ वैसे ही ] बढ़ते जाते थे, जैसे प्रत्येक लाभपर लोभ बढ़ता है॥१॥

चौ०

अतिबल कुंभकरन अस भ्राता। जेहि कहुँ नहिं प्रतिभट जग जाता॥ करइ पान सोवइ षट मासा। जागत होइ तिहूँ पुर त्रासा॥२॥

भावार्थ

अत्यन्त बलवान्‌ कुम्भकर्ण-सा उसका भाई था, जिसके जोड़का योद्धा जगत्‌में पैदा ही नहीं हुआ। वह मदिरा पीकर छः महीने सोया करता था। उसके जागते ही तीनों लोकोंमें तहलका मच जाता था॥२॥

चौ०

जौं दिन प्रति अहार कर सोई। बिस्व बेगि सब चौपट होई॥ समर धीर नहिं जाइ बखाना। तेहि सम अमित बीर बलवाना॥३॥

भावार्थ

यदि वह प्रतिदिन भोजन करता, तब तो सम्पूर्ण विश्व शीघ्र ही चौपट ( खाली ) हो जाता। रणधीर ऐसा था कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। [ लङ्कामें ] उसके ऐसे असंख्य बलवान्‌ वीर थे॥३॥

चौ०

बारिदनाद जेठ सुत तासू। भट महुँ प्रथम लीक जग जासू॥ जेहि न होइ रन सनमुख कोई। सुरपुर नितहिं परावन होई॥४॥

भावार्थ

मेघनाद रावणका बड़ा लड़का था, जिसका जगत्‌के योद्धाओंमें पहला नंबर था। रणमें कोई भी उसका सामना नहीं कर सकता था। स्वर्गमें तो [ उसके भयसे ] नित्य भगदड़ मची रहती थी॥४॥

दो०

कुमुख अकंपन कुलिसरद धूमकेतु अतिकाय। एक एक जग जीति सक ऐसे सुभट निकाय॥१८०॥

भावार्थ

[ इनके अतिरिक्त ] दुर्मुख, अकम्पन, वज्रदन्त, धूमकेतु और अतिकाय आदि ऐसे अनेक योद्धा थे, जो अकेले ही सारे जगत्‌को जीत सकते थे॥१८०॥

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