दोहा 181
कामरूप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया॥ दसमुख बैठ सभाँ एक बारा। देखि अमित आपन परिवारा॥१॥
भावार्थ
सभी राक्षस मनमाना रूप बना सकते थे और [ आसुरी ] माया जानते थे। उनके दया-धर्म स्वप्नमें भी नहीं था। एक बार सभामें बैठे हुए रावणने अपने अगणित परिवारको देखा— ॥१॥
सुत समूह जन परिजन नाती। गनै को पार निसाचर जाती॥ सेन बिलोकि सहज अभिमानी। बोला बचन क्रोध मद सानी॥२॥
भावार्थ
पुत्र-पौत्र, कुटुम्बी और सेवक ढेर-के-ढेर थे। [ सारी ] राक्षसोंकी जातियोंको तो गिन ही कौन सकता था? अपनी सेनाको देखकर स्वभावसे ही अभिमानी रावण क्रोध और गर्वमें सनी हुई वाणी बोला— ॥२॥
सुनहु सकल रजनीचर जूथा। हमरे बैरी बिबुध बरूथा॥ ते सनमुख नहिं करहिं लराई। देखि सबल रिपु जाहिं पराई॥३॥
भावार्थ
हे समस्त राक्षसोंके दलो! सुनो, देवतागण हमारे शत्रु हैं। वे सामने आकर युद्ध नहीं करते। बलवान् शत्रुको देखकर भाग जाते हैं॥३॥
तेन्ह कर मरन एक बिधि होई। कहउँ बुझाइ सुनहु अब सोई॥ द्विजभोजन मख होम सराधा। सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा॥४॥
भावार्थ
उनका मरण एक ही उपायसे हो सकता है, मैं समझाकर कहता हूँ। अब उसे सुनो। [ उनके बलको बढ़ानेवाले ] ब्राह्मणभोजन, यज्ञ, हवन और श्राद्ध—इन सबमें जाकर तुम बाधा डालो॥४॥
छुधा छीन बलहीन सुर सहजेहिं मिलिहहिं आइ। तब मारिहउँ कि छाड़िहउँ भली भाँति अपनाइ॥१८१॥
भावार्थ
भूखसे दुर्बल और बलहीन होकर देवता सहजहीमें आ मिलेंगे। तब उनको मैं मार डालूँगा अथवा भलीभाँति अपने अधीन करके [ सर्वथा पराधीन करके ] छोड़ दूँगा॥१८१॥
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