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दोहा 172

चौ०

आपु बिरचि उपरोहित रूपा। परेउ जाइ तेहि सेज अनूपा॥ जागेउ नृप अनभएँ बिहाना। देखि भवन अति अचरजु माना॥१॥

भावार्थ

वह आप पुरोहितका रूप बनाकर उसकी सुन्दर सेजपर जा लेटा। राजा सबेरा होनेसे पहले ही जागा और अपना घर देखकर उसने बड़ा ही आश्चर्य माना॥१॥

चौ०

मुनि महिमा मन महुँ अनुमानी। उठेउ गवँहिं जेहिं जान न रानी॥ कानन गयउ बाजि चढ़ि तेहीं। पुर नर नारि न जानेउ केहीं॥२॥

भावार्थ

मनमें मुनिकी महिमाका अनुमान करके वह धीरेसे उठा, जिसमें रानी न जान पावे। फिर उसी घोड़ेपर चढ़कर वनको चला गया। नगरके किसी भी स्त्री-पुरुषने नहीं जाना॥२॥

चौ०

गएँ जाम जुग भूपति आवा। घर घर उत्सव बाज बधावा॥ उपरोहितहि देख जब राजा। चकित बिलोक सुमिरि सोइ काजा॥ ३ ॥

भावार्थ

दो पहर बीत जानेपर राजा आया। घर-घर उत्सव होने लगे और बधावा बजने लगा। जब राजाने पुरोहितको देखा, तब वह [ अपने ] उसी कार्यका स्मरणकर उसे आश्चर्यसे देखने लगा॥३॥

चौ०

जुग सम नृपहि गए दिन तीनी। कपटी मुनि पद रह मति लीनी॥ समय जानि उपरोहित आवा। नृपहि मते सब कहि समुझावा॥४॥

भावार्थ

राजाको तीन दिन युगके समान बीते। उसकी बुद्धि कपटी मुनिके चरणोंमें लगी रही। निश्चित समय जानकर पुरोहित [ बना हुआ राक्षस ] आया और राजाके साथ की हुई गुप्त सलाहके अनुसार [ उसने अपने ] सब विचार उसे समझाकर कह दिये॥४॥

दो०

नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत। बरे तुरत सत सहस बर बिप्र कुटुंब समेत॥१७२॥

भावार्थ

[ संकेतके अनुसार ] गुरुको [ उस रूपमें ] पहचानकर राजा प्रसन्न हुआ। भ्रमवश उसे चेत न रहा [ कि यह तापस मुनि है या कालकेतु राक्षस ]। उसने तुरंत एक लाख उत्तम ब्राह्मणोंको कुटुम्बसहित निमन्त्रण दे दिया॥१७२॥

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