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दोहा 171

चौ०

तापस नृप निज सखहि निहारी। हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी॥ मित्रहि कहि सब कथा सुनाई। जातुधान बोला सुख पाई॥१॥

भावार्थ

तपस्वी राजा अपने मित्रको देख प्रसन्न हो उठकर मिला और सुखी हुआ। उसने मित्रको सब कथा कह सुनायी, तब राक्षस आनन्दित होकर बोला॥१॥

चौ०

अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा। जौं तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा॥ परिहरि सोच रहहु तुम्ह सोई। बिनु औषध बिआधि बिधि खोई॥२॥

भावार्थ

हे राजन्! सुनो, जब तुमने मेरे कहनेके अनुसार [ इतना ] काम कर लिया, तो अब मैंने शत्रुको काबूमें कर ही लिया [ समझो ]। तुम अब चिन्ता त्याग सो रहो। विधाताने बिना ही दवाके रोग दूर कर दिया॥२॥

चौ०

कुल समेत रिपु मूल बहाई। चौथें दिवस मिलब मैं आई॥ तापस नृपहि बहुत परितोषी। चला महाकपटी अतिरोषी॥३॥

भावार्थ

कुलसहित शत्रुको जड़-मूलसे उखाड़-बहाकर, [ आजसे ] चौथे दिन मैं तुमसे आ मिलूँगा। [ इस प्रकार ] तपस्वी राजाको खूब दिलासा देकर वह महामायावी और अत्यन्त क्रोधी राक्षस चला॥३॥

चौ०

भानुप्रतापहि बाजि समेता। पहुँचाएसि छन माझ निकेता॥ नृपहि नारि पहिं सयन कराई। हयगृहँ बाँधेसि बाजि बनाई॥४॥

भावार्थ

उसने प्रतापभानु राजाको घोड़ेसहित क्षणभरमें घर पहुँचा दिया। राजाको रानीके पास सुलाकर घोड़ेको अच्छी तरहसे घुड़सालमें बाँध दिया॥४॥

दो०

राजा के उपरोहितहि हरि लै गयउ बहोरि। लै राखेसि गिरि खोह महुँ मायाँ करि मति भोरि॥१७१॥

भावार्थ

फिर वह राजाके पुरोहितको उठा ले गया और मायासे उसकी बुद्धिको भ्रममें डालकर उसे उसने पहाड़की खोहमें ला रखा॥१७१॥

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