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दोहा 173

चौ०

उपरोहित जेवनार बनाई। छरस चारि बिधि जसि श्रुति गाई॥ मायामय तेहिं कीन्हि रसोई। बिंजन बहु गनि सकइ न कोई॥१॥

भावार्थ

पुरोहितने छः रस और चार प्रकारके भोजन, जैसा कि वेदोंमें वर्णन है, बनाये। उसने मायामयी रसोई तैयार की और इतने व्यञ्जन बनाये जिन्हें कोई गिन नहीं सकता॥१॥

चौ०

बिबिध मृगन्ह कर आमिष राँधा। तेहि महुँ बिप्र माँसु खल साँधा॥ भोजन कहुँ सब बिप्र बोलाए। पद पखारि सादर बैठाए॥२॥

भावार्थ

अनेक प्रकारके पशुओंका मांस पकाया और उसमें उस दुष्टने ब्राह्मणोंका मांस मिला दिया। सब ब्राह्मणोंको भोजनके लिये बुलाया और चरण धोकर आदरसहित बैठाया॥२॥

चौ०

परुसन जबहिं लाग महिपाला। भै अकासबानी तेहि काला॥ बिप्रबृंद उठि उठि गृह जाहू। है बड़ि हानि अन्न जनि खाहू॥३॥

भावार्थ

ज्यों ही राजा परोसने लगा, उसी काल [ कालकेतुकृत ] आकाशवाणी हुई—हे ब्राह्मणो! उठ-उठकर अपने घर जाओ; यह अन्न मत खाओ। इस [ के खाने ] में बड़ी हानि है॥३॥

चौ०

भयउ रसोईं भूसुर माँसू। सब द्विज उठे मानि बिस्वासू॥ भूप बिकल मति मोहँ भुलानी। भावी बस न आव मुख बानी॥४॥

भावार्थ

रसोईमें ब्राह्मणोंका मांस बना है। [ आकाशवाणीका ] विश्वास मानकर सब ब्राह्मण उठ खड़े हुए। राजा व्याकुल हो गया। [ परन्तु ] उसकी बुद्धि मोहमें भूली हुई थी। होनहारवश उसके मुँहसे [ एक ] बात [ भी ] न निकली॥४॥

दो०

बोले बिप्र सकोप तब नहिं कछु कीन्ह बिचार। जाइ निसाचर होहु नृप मूढ़ सहित परिवार॥१७३॥

भावार्थ

तब ब्राह्मण क्रोधसहित बोल उठे—उन्होंने कुछ भी विचार नहीं किया—अरे मूर्ख राजा! तू जाकर परिवारसहित राक्षस हो॥१७३॥

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