दोहा 144
करहिं अहार साक फल कंदा। सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा॥ पुनि हरि हेतु करन तप लागे। बारि अधार मूल फल त्यागे॥१॥
भावार्थ
वे साग, फल और कन्दका आहार करते थे और सच्चिदानन्द ब्रह्मका स्मरण करते थे। फिर वे श्रीहरिके लिये तप करने लगे और मूल-फलको त्यागकर केवल जलके आधारपर रहने लगे॥१॥
उर अभिलाष निरंतर होई। देखिअ नयन परम प्रभु सोई॥ अगुन अखंड अनंत अनादी। जेहि चिंतहिं परमारथबादी॥२॥
भावार्थ
हृदयमें निरन्तर यही अभिलाषा हुआ करती कि हम [ कैसे ] उन परम प्रभुको आँखोंसे देखें, जो निर्गुण, अखण्ड, अनन्त और अनादि हैं और परमार्थवादी ( ब्रह्मज्ञानी, तत्त्ववेत्ता ) लोग जिनका चिन्तन किया करते हैं॥२॥
नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद निरुपाधि अनूपा॥ संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना॥३॥
भावार्थ
जिन्हें वेद ‘नेति-नेति’ ( यह भी नहीं, यह भी नहीं ) कहकर निरूपण करते हैं। जो आनन्दस्वरूप, उपाधिरहित और अनुपम हैं, एवं जिनके अंशसे अनेकों शिव, ब्रह्मा और विष्णुभगवान् प्रकट होते हैं॥३॥
ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई। भगत हेतु लीलातनु गहई॥ जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा। तौ हमार पूजिहि अभिलाषा॥४॥
भावार्थ
ऐसे [ महान् ] प्रभु भी सेवकके वशमें हैं और भक्तोंके लिये [ दिव्य ] लीलाविग्रह धारण करते हैं। यदि वेदोंमें यह वचन सत्य कहा है तो हमारी अभिलाषा भी अवश्य पूरी होगी॥४॥
एहि बिधि बीते बरष षट सहस बारि आहार। संबत सप्त सहस्र पुनि रहे समीर अधार॥१४४॥
भावार्थ
इस प्रकार जलका आहार [ करके तप ] करते छः हजार वर्ष बीत गये। फिर सात हजार वर्ष वे वायुके आधारपर रहे॥१४४॥
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