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दोहा 143

चौ०

बरबस राज सुतहि तब दीन्हा। नारि समेत गवन बन कीन्हा॥ तीरथ बर नैमिष बिख्याता। अति पुनीत साधक सिधि दाता॥१॥

भावार्थ

तब मनुजीने अपने पुत्रको जबर्दस्ती राज्य देकर स्वयं स्त्रीसहित वनको गमन किया। अत्यन्त पवित्र और साधकोंको सिद्धि देनेवाला तीर्थोंमें श्रेष्ठ नैमिषारण्य प्रसिद्ध है॥१॥

चौ०

बसहिं तहाँ मुनि सिद्ध समाजा। तहँ हियँ हरषि चलेउ मनु राजा॥ पंथ जात सोहहिं मतिधीरा। ग्यान भगति जनु धरें सरीरा॥२॥

भावार्थ

वहाँ मुनियों और सिद्धोंके समूह बसते हैं। राजा मनु हृदयमें हर्षित होकर वहीं चले। वे धीर बुद्धिवाले राजा-रानी मार्गमें जाते हुए ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो ज्ञान और भक्ति ही शरीर धारण किये जा रहे हों॥२॥

चौ०

पहुँचे जाइ धेनुमति तीरा। हरषि नहाने निरमल नीरा॥ आए मिलन सिद्ध मुनि ग्यानी। धरम धुरंधर नृपरिषि जानी॥३॥

भावार्थ

[ चलते-चलते ] वे गोमतीके किनारे जा पहुँचे। हर्षित होकर उन्होंने निर्मल जलमें स्नान किया। उनको धर्मधुरन्धर राजर्षि जानकर सिद्ध और ज्ञानी मुनि उनसे मिलने आये॥३॥

चौ०

जहँ जहँ तीरथ रहे सुहाए। मुनिन्ह सकल सादर करवाए॥ कृस सरीर मुनिपट परिधाना। सत समाज नित सुनहिं पुराना॥४॥

भावार्थ

जहाँ-जहाँ सुन्दर तीर्थ थे, मुनियोंने आदरपूर्वक सभी तीर्थ उनको करा दिये। उनका शरीर दुर्बल हो गया था, वे मुनियोंके-से ( वल्कल ) वस्त्र धारण करते थे और संतोंके समाजमें नित्य पुराण सुनते थे॥४॥

दो०

द्वादस अच्छर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग। बासुदेव पद पंकरुह दंपति मन अति लाग॥१४३॥

भावार्थ

और द्वादशाक्षर मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ) का प्रेमसहित जप करते थे। भगवान्‌ वासुदेवके चरणकमलोंमें उन राजा-रानीका मन बहुत ही लग गया॥१४३॥

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