दोहा 145
बरष सहस दस त्यागेउ सोऊ। ठाढ़े रहे एक पद दोऊ॥ बिधि हरि हर तप देखि अपारा। मनु समीप आए बहु बारा॥१॥
भावार्थ
दस हजार वर्षतक उन्होंने वायुका आधार भी छोड़ दिया। दोनों एक पैरसे खड़े रहे। उनका अपार तप देखकर ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी कई बार मनुजीके पास आये॥१॥
मागहु बर बहु भाँति लोभाए। परम धीर नहिं चलहिं चलाए॥ अस्थिमात्र होइ रहे सरीरा। तदपि मनाग मनहिं नहिं पीरा॥२॥
भावार्थ
उन्होंने इन्हें अनेक प्रकारसे ललचाया और कहा कि कुछ वर माँगो। पर ये परम धैर्यवान् [ राजा-रानी अपने तपसे किसीके ] डिगाये नहीं डिगे। यद्यपि उनका शरीर हड्डियोंका ढाँचामात्र रह गया था, फिर भी उनके मनमें जरा भी पीड़ा नहीं थी॥ २ ॥
प्रभु सर्बग्य दास निज जानी। गति अनन्य तापस नृप रानी॥ मागु मागु बरु भै नभ बानी। परम गभीर कृपामृत सानी॥३॥
भावार्थ
सर्वज्ञ प्रभुने अनन्य गति ( आश्रय ) वाले तपस्वी राजा-रानीको ‘निज दास’ जाना। तब परम गम्भीर और कृपारूपी अमृतसे सनी हुई यह आकाशवाणी हुई कि ‘वर माँगो’॥ ३ ॥
मृतक जिआवनि गिरा सुहाई। श्रवन रंध्र होइ उर जब आई॥ हृष्ट पुष्ट तन भए सुहाए। मानहुँ अबहिं भवन ते आए॥४॥
भावार्थ
मुर्देको भी जिला देनेवाली यह सुन्दर वाणी कानोंके छेदोंसे होकर जब हृदयमें आयी, तब राजा-रानीके शरीर ऐसे सुन्दर और हृष्ट-पुष्ट हो गये, मानो अभी घरसे आये हैं॥ ४ ॥
श्रवन सुधा सम बचन सुनि पुलक प्रफुल्लित गात। बोले मनु करि दंडवत प्रेम न हृदयँ समात॥१४५॥
भावार्थ
कानोंमें अमृतके समान लगनेवाले वचन सुनते ही उनका शरीर पुलकित और प्रफुल्लित हो गया। तब मनुजी दण्डवत् करके बोले, प्रेम हृदयमें समाता न था—॥ १४५ ॥
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