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दोहा 108

चौ०

जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी। जानिअ सत्य मोहि निज दासी॥ तौ प्रभु हरहु मोर अग्याना। कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना॥१॥

भावार्थ

हे सुखकी राशि! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और सचमुच मुझे अपनी दासी [ या अपनी सच्ची दासी ] जानते हैं, तो हे प्रभो! आप श्रीरघुनाथजीकी नाना प्रकारकी कथा कहकर मेरा अज्ञान दूर कीजिये॥१॥

चौ०

जासु भवनु सुरतरु तर होई। सहि कि दरिद्र जनित दुखु सोई॥ ससिभूषन अस हृदयँ बिचारी। हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी॥२॥

भावार्थ

जिसका घर कल्पवृक्षके नीचे हो, वह भला दरिद्रतासे उत्पन्न दुःखको क्यों सहेगा? हे शशिभूषण! हे नाथ! हृदयमें ऐसा विचारकर मेरी बुद्धिके भारी भ्रमको दूर कीजिये॥२॥

चौ०

प्रभु जे मुनि परमारथबादी। कहहिं राम कहुँ ब्रह्म अनादी॥ सेस सारदा बेद पुराना। सकल करहिं रघुपति गुन गाना॥३॥

भावार्थ

हे प्रभो! जो परमार्थतत्त्व ( ब्रह्म ) के ज्ञाता और वक्ता मुनि हैं, वे श्रीरामचन्द्रजीको अनादि ब्रह्म कहते हैं; और शेष, सरस्वती, वेद और पुराण सभी श्रीरघुनाथजीका गुण गाते हैं॥३॥

चौ०

तुम्ह पुनि राम राम दिन राती। सादर जपहु अनँग आराती॥ रामु सो अवध नृपति सुत सोई। की अज अगुन अलखगति कोई॥४॥

भावार्थ

और हे कामदेवके शत्रु! आप भी दिन-रात आदरपूर्वक राम-राम जपा करते हैं। ये राम वही अयोध्याके राजाके पुत्र हैं? या अजन्मा, निर्गुण और अगोचर कोई और राम हैं?॥४॥

दो०

जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि नारि बिरहँ मति भोरि। देखि चरित महिमा सुनत भ्रमति बुद्धि अति मोरि॥१०८॥

भावार्थ

यदि वे राजपुत्र हैं तो ब्रह्म कैसे? [ और यदि ब्रह्म हैं तो ] स्त्रीके विरहमें उनकी मति बावली कैसे हो गयी? इधर उनके ऐसे चरित्र देखकर और उधर उनकी महिमा सुनकर मेरी बुद्धि अत्यन्त चकरा रही है॥१०८॥

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