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दोहा 107

चौ०

बैठे सोह कामरिपु कैसें। धरें सरीरु सांतरसु जैसें॥ पारबती भल अवसरु जानी। गईं संभु पहिं मातु भवानी॥ १ ॥

भावार्थ

कामदेवके शत्रु शिवजी वहाँ बैठे हुए ऐसे शोभित हो रहे थे, मानो शान्तरस ही शरीर धारण किये बैठा हो। अच्छा मौका जानकर शिवपत्नी माता पार्वतीजी उनके पास गयीं॥१॥

चौ०

जानि प्रिया आदरु अति कीन्हा। बाम भाग आसनु हर दीन्हा॥ बैठीं सिव समीप हरषाई। पूरुब जन्म कथा चित आई॥२॥

भावार्थ

अपनी प्यारी पत्नी जानकर शिवजीने उनका बहुत आदर-सत्कार किया और अपनी बायीं ओर बैठनेके लिये आसन दिया। पार्वतीजी प्रसन्न होकर शिवजीके पास बैठ गयीं। उन्हें पिछले जन्मकी कथा स्मरण हो आयी॥२॥

चौ०

पति हियँ हेतु अधिक अनुमानी। बिहसि उमा बोलीं प्रिय बानी॥ कथा जो सकल लोक हितकारी। सोइ पूछन चह सैलकुमारी॥३॥

भावार्थ

स्वामीके हृदयमें [ अपने ऊपर पहलेकी अपेक्षा ] अधिक प्रेम समझकर पार्वतीजी हँसकर प्रिय वचन बोलीं। [ याज्ञवल्क्यजी कहते हैं कि ] जो कथा सब लोगोंका हित करनेवाली है, उसे ही पार्वतीजी पूछना चाहती हैं॥३॥

चौ०

बिस्वनाथ मम नाथ पुरारी। त्रिभुवन महिमा बिदित तुम्हारी॥ चर अरु अचर नाग नर देवा। सकल करहिं पद पंकज सेवा॥४॥

भावार्थ

[ पार्वतीजीने कहा— ] हे संसारके स्वामी! हे मेरे नाथ! हे त्रिपुरासुरका वध करनेवाले! आपकी महिमा तीनों लोकोंमें विख्यात है। चर, अचर, नाग, मनुष्य और देवता सभी आपके चरणकमलोंकी सेवा करते हैं॥४॥

दो०

प्रभु समरथ सर्बग्य सिव सकल कला गुन धाम। जोग ग्यान बैराग्य निधि प्रनत कलपतरु नाम॥१०७॥

भावार्थ

हे प्रभो! आप समर्थ, सर्वज्ञ और कल्याणस्वरूप हैं। सब कलाओं और गुणोंके निधान हैं और योग, ज्ञान तथा वैराग्यके भण्डार हैं। आपका नाम शरणागतोंके लिये कल्पवृक्ष है॥१०७॥

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