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दोहा 104

चौ०

संभु चरित सुनि सरस सुहावा। भरद्वाज मुनि अति सुखु पावा॥ बहु लालसा कथा पर बाढ़ी। नयनन्हि नीरु रोमावलि ठाढ़ी॥१॥

भावार्थ

शिवजीके रसीले और सुहावने चरित्रको सुनकर मुनि भरद्वाजजीने बहुत ही सुख पाया। कथा सुननेकी उनकी लालसा बहुत बढ़ गयी। नेत्रोंमें जल भर आया तथा रोमावली खड़ी हो गयी॥१॥

चौ०

प्रेम बिबस मुख आव न बानी। दसा देखि हरषे मुनि ग्यानी॥ अहो धन्य तव जन्मु मुनीसा। तुम्हहि प्रान सम प्रिय गौरीसा॥२॥

भावार्थ

वे प्रेममें मुग्ध हो गये, मुखसे वाणी नहीं निकलती। उनकी यह दशा देखकर ज्ञानी मुनि याज्ञवल्क्य बहुत प्रसन्न हुए [ और बोले— ] हे मुनीश! अहा हा! तुम्हारा जन्म धन्य है; तुमको गौरीपति शिवजी प्राणोंके समान प्रिय हैं॥२॥

चौ०

सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं॥ बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू॥३॥

भावार्थ

शिवजीके चरणकमलोंमें जिनकी प्रीति नहीं है, वे श्रीरामचन्द्रजीको स्वप्नमें भी अच्छे नहीं लगते। विश्वनाथ श्रीशिवजीके चरणोंमें निष्कपट ( विशुद्ध ) प्रेम होना यही रामभक्तका लक्षण है॥३॥

चौ०

सिव सम को रघुपति ब्रतधारी। बिनु अघ तजी सती असि नारी॥ पनु करि रघुपति भगति देखाई। को सिव सम रामहि प्रिय भाई॥४॥

भावार्थ

शिवजीके समान रघुनाथजी [ की भक्ति ] का व्रत धारण करनेवाला कौन है? जिन्होंने बिना ही पापके सती-जैसी स्त्रीको त्याग दिया और प्रतिज्ञा करके श्रीरघुनाथजीकी भक्तिको दिखा दिया। हे भाई! श्रीरामचन्द्रजीको शिवजीके समान और कौन प्यारा है?॥४॥

दो०

प्रथमहिं मैं कहि सिव चरित बूझा मरमु तुम्हार। सुचि सेवक तुम्ह राम के रहित समस्त बिकार॥१०४॥

भावार्थ

मैंने पहले ही शिवजीका चरित्र कहकर तुम्हारा भेद समझ लिया। तुम श्रीरामचन्द्रजीके पवित्र सेवक हो और समस्त दोषोंसे रहित हो॥१०४॥

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