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दोहा 105

चौ०

मैं जाना तुम्हार गुन सीला। कहउँ सुनहु अब रघुपति लीला॥ सुनु मुनि आजु समागम तोरें। कहि न जाइ जस सुखु मन मोरें॥१॥

भावार्थ

मैंने तुम्हारा गुण और शील जान लिया। अब मैं श्रीरघुनाथजीकी लीला कहता हूँ, सुनो। हे मुनि! सुनो, आज तुम्हारे मिलनेसे मेरे मनमें जो आनन्द हुआ है, वह कहा नहीं जा सकता॥१॥

चौ०

राम चरित अति अमित मुनीसा। कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा॥ तदपि जथाश्रुत कहउँ बखानी। सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी॥२॥

भावार्थ

हे मुनीश्वर! रामचरित्र अत्यन्त अपार है। सौ करोड़ शेषजी भी उसे नहीं कह सकते। तथापि जैसा मैंने सुना है, वैसा वाणीके स्वामी ( प्रेरक ) और हाथमें धनुष लिये हुए प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके कहता हूँ॥२॥

चौ०

सारद दारुनारि सम स्वामी। रामु सूत्रधर अंतरजामी॥ जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी॥३॥

भावार्थ

सरस्वतीजी कठपुतलीके समान हैं और अन्तर्यामी स्वामी श्रीरामचन्द्रजी [ सूत पकड़कर कठपुतलीको नचानेवाले ] सूत्रधार हैं। अपना भक्त जानकर जिस कविपर वे कृपा करते हैं, उसके हृदयरूपी आँगनमें सरस्वतीको वे नचाया करते हैं॥३॥

चौ०

प्रनवउँ सोइ कृपाल रघुनाथा। बरनउँ बिसद तासु गुन गाथा॥ परम रम्य गिरिबरु कैलासू। सदा जहाँ सिव उमा निवासू॥४॥

भावार्थ

उन्हीं कृपालु श्रीरघुनाथजीको मैं प्रणाम करता हूँ और उन्हींके निर्मल गुणोंकी कथा कहता हूँ। कैलास पर्वतोंमें श्रेष्ठ और बहुत ही रमणीय है, जहाँ शिव-पार्वतीजी सदा निवास करते हैं॥४॥

दो०

सिद्ध तपोधन जोगिजन सुर किंनर मुनिबृंद। बसहिं तहाँ सुकृती सकल सेवहिं सिव सुखकंद॥१०५॥

भावार्थ

सिद्ध, तपस्वी, योगीगण, देवता, किन्नर और मुनियोंके समूह उस पर्वतपर रहते हैं। वे सब बड़े पुण्यात्मा हैं और आनन्दकन्द श्रीमहादेवजीकी सेवा करते हैं॥१०५॥

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