Ramayana.com

दोहा 103

चौ०

तुरत भवन आए गिरिराई। सकल सैल सर लिए बोलाई॥ आदर दान बिनय बहुमाना। सब कर बिदा कीन्ह हिमवाना॥१॥

भावार्थ

पर्वतराज हिमाचल तुरंत घर आये और उन्होंने सब पर्वतों और सरोवरोंको बुलाया। हिमवान्‌ने आदर, दान, विनय और बहुत सम्मानपूर्वक सबकी विदाई की॥१॥

चौ०

जबहिं संभु कैलासहिं आए। सुर सब निज निज लोक सिधाए॥ जगत मातु पितु संभु भवानी। तेहिं सिंगारु न कहउँ बखानी॥२॥

भावार्थ

जब शिवजी कैलास पर्वतपर पहुँचे, तब सब देवता अपने-अपने लोकोंको चले गये। [ तुलसीदासजी कहते हैं कि ] पार्वतीजी और शिवजी जगत्‌के माता-पिता हैं, इसलिये मैं उनके शृङ्गारका वर्णन नहीं करता॥२॥

चौ०

करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा। गनन्ह समेत बसहिं कैलासा॥ हर गिरिजा बिहार नित नयऊ। एहि बिधि बिपुल काल चलि गयऊ॥३॥

भावार्थ

शिव-पार्वती विविध प्रकारके भोग-विलास करते हुए अपने गणोंसहित कैलासपर रहने लगे। वे नित्य नये विहार करते थे। इस प्रकार बहुत समय बीत गया॥३॥

चौ०

तब जनमेउ षटबदन कुमारा। तारकु असुरु समर जेहिं मारा॥ आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। षन्मुख जन्मु सकल जग जाना॥४॥

भावार्थ

तब छः मुखवाले पुत्र ( स्वामिकार्तिक ) का जन्म हुआ, जिन्होंने [ बड़े होनेपर ] युद्धमें तारकासुरको मारा। वेद, शास्त्र और पुराणोंमें स्वामिकार्तिकके जन्मकी कथा प्रसिद्ध है और सारा जगत्‌ उसे जानता है॥४॥

छं०

जगु जान षन्मुख जन्मु कर्मु प्रतापु पुरुषारथु महा। तेहि हेतु मैं बृषकेतु सुत कर चरित संछेपहिं कहा॥ यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं। कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं॥

भावार्थ

षडानन ( स्वामिकार्तिक ) के जन्म, कर्म, प्रताप और महान्‌ पुरुषार्थको सारा जगत्‌ जानता है। इसलिये मैंने वृषकेतु ( शिवजी ) के पुत्रका चरित्र संक्षेपसे ही कहा है। शिव-पार्वतीके विवाहकी इस कथाको जो स्त्री-पुरुष कहेंगे और गायेंगे, वे कल्याणके कार्यों और विवाहादि मङ्गलोंमें सदा सुख पावेंगे।

दो०

चरित सिंधु गिरिजा रमन बेद न पावहिं पारु। बरनै तुलसीदासु किमि अति मतिमंद गवाँरु॥१०३॥

भावार्थ

गिरिजापति महादेवजीका चरित्र समुद्रके समान ( अपार ) है, उसका पार वेद भी नहीं पाते। तब अत्यन्त मन्दबुद्धि और गँवार तुलसीदास उसका वर्णन कैसे कर सकता है!॥१०३॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें