दोहा 61
मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं॥ राजकुमारि सिखावनु सुनहू। आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू॥१॥
भावार्थ
माताके सामने सीताजीसे कुछ कहनेमें सकुचाते हैं। पर मनमें यह समझकर कि यह समय ऐसा ही है, वे बोले—हे राजकुमारी! मेरी सिखावन सुनो। मनमें कुछ दूसरी तरह न समझ लेना॥१॥
आपन मोर नीक जौं चहहू। बचनु हमार मानि गृह रहहू॥ आयसु मोर सासु सेवकाई। सब बिधि भामिनि भवन भलाई॥२॥
भावार्थ
जो अपना और मेरा भला चाहती हो, तो मेरा वचन मानकर घर रहो। हे भामिनी! मेरी आज्ञाका पालन होगा, सासकी सेवा बन पड़ेगी। घर रहनेमें सभी प्रकारसे भलाई है॥२॥
एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा। सादर सासु ससुर पद पूजा॥ जब जब मातु करिहि सुधि मोरी। होइहि प्रेम बिकल मति भोरी॥३॥
भावार्थ
आदरपूर्वक सास-ससुरके चरणोंकी पूजा ( सेवा ) करनेसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है। जब-जब माता मुझे याद करेंगी और प्रेमसे व्याकुल होनेके कारण उनकी बुद्धि भोली हो जायगी ( वे अपने-आपको भूल जायँगी ), ॥३॥
तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी। सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी॥ कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही। सुमुखि मातु हित राखउँ तोही॥४॥
भावार्थ
हे सुन्दरी! तब-तब तुम कोमल वाणीसे पुरानी कथाएँ कह-कहकर इन्हें समझाना। हे सुमुखि! मुझे सैकड़ों सौगन्ध हैं, मैं यह स्वभावसे ही कहता हूँ कि मैं तुम्हें केवल माताके लिये ही घरपर रखता हूँ॥४॥
गुर श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस। हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस॥६१॥
भावार्थ
[ मेरी आज्ञा मानकर घरपर रहनेसे ] गुरु और वेदके द्वारा सम्मत धर्म [ के आचरण ] का फल तुम्हें बिना ही क्लेशके मिल जाता है। किन्तु हठके वश होकर गालव मुनि और राजा नहुष आदि सबने संकट ही सहे॥६१॥
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